उत्तर प्रदेश में जन्म प्रमाणपत्र जारी करने से जुड़े एक मामले ने पूरे राज्य की प्रशासनिक प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट की डबल बेंच के सामने जब यह मामला आया, तो अदालत ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि जन्म प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ हो रही हैं।
18 नवंबर को पारित आदेश में कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा—“प्रथम दृष्टया यह एक गड़बड़ है। ऐसा प्रतीत होता है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी समय राज्य में कहीं से भी अपनी इच्छानुसार जन्मतिथि का प्रमाणपत्र जारी करवा सकता है।”
इस टिप्पणी ने न सिर्फ मामले को गंभीर बनाया, बल्कि पूरे प्रदेश में जन्म-पंजीकरण की डिजिटल और मैनुअल प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत के सुर स्पष्ट थे—यह मामला लापरवाही भर नहीं, बल्कि किसी संगठित ढीलेपन या भ्रष्टाचार की ओर संकेत करता है।
“सभी स्तरों पर बेईमानी की हद” – अदालत के सख्त शब्द
हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यूपी के प्रशासनिक ढांचे पर भी तीखे सवाल उछाले। पीठ ने कहा कि सिस्टम में इस तरह की गड़बड़ी यह दर्शाती है कि “सभी स्तरों पर बेईमानी की हद पार हो चुकी है।”
आदेश में अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि जन्म प्रमाणपत्र—जो शिक्षा, सरकारी नौकरी, पेंशन, पासपोर्ट, सामाजिक कल्याण योजनाओं और अदालत में प्रमाण के रूप में उपयोग होता है—उसकी वैधता पर ही संदेह पैदा हो रहा है।
प्रशासन के रिकॉर्ड से यह भी स्पष्ट हुआ कि कई मामलों में बिना उचित सत्यापन के जन्म प्रमाणपत्र जारी किए गए, वहीं कुछ मामलों में पुराने रिकॉर्ड को बदलकर नई जन्मतिथियाँ दर्ज कर दी गईं।
इन गड़बड़ियों से यह अंदेशा बढ़ गया है कि प्रमाणपत्रों का दुरुपयोग कर उम्र छुपाने, सरकारी लाभों में फेरबदल, नौकरी के अवसरों में गलत फायदा लेने और दस्तावेज़ों की जालसाजी जैसे अपराधों को बढ़ावा मिला होगा।
जांच के निर्देश, अधिकारियों को तलब करने की चेतावनी
मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने संबंधित नगर निकायों से पूरा रिकॉर्ड तलब किया है। कोर्ट के अनुसार, जन्म प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्थाओं को यह बताना होगा कि किन आधारों पर प्रमाणपत्र जारी किए गए, किसने आवेदन की पड़ताल की, और किस पदाधिकारी ने अंतिम मंजूरी दी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि रिकॉर्ड में विसंगतियाँ पाई गईं तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई तय है। हाई कोर्ट ने प्रशासन को निर्देश दिया है कि सभी नगर निगमों, नगर पालिकाओं और ग्राम पंचायतों में जन्म-पंजीकरण की प्रक्रिया का एक व्यापक ऑडिट कराया जाए।
इसके अलावा कोर्ट ने सरकार से यह भी पूछा है कि क्या राज्य में जन्म प्रमाणपत्र जारी करने के लिए कोई केंद्रीकृत डिजिटल वेरिफिकेशन सिस्टम मौजूद है या नहीं। यदि है, तो उसमें इस तरह की गड़बड़ी कैसे हो सकती है?
इन सवालों ने प्रशासन को कठिन स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि जन्म-पंजीकरण प्रक्रिया अक्सर स्थानीय स्तर पर संचालित होती रही है और कई जगहों पर भ्रष्टाचार की शिकायतें पहले भी मिलती रही हैं।
सरकार पर बढ़ा दबाव, बड़े सुधारों की तैयारी शुरू
हाई कोर्ट के कठोर रुख के बाद यूपी सरकार पर अब जन्म-पंजीकरण प्रणाली को पूरी तरह से दुरुस्त करने का दबाव बढ़ गया है। सूत्रों का कहना है कि सरकार इस मामले को लेकर एक उच्चस्तरीय जांच समिति बनाने पर विचार कर रही है, जो पूरे सिस्टम का तकनीकी और प्रशासनिक विश्लेषण करेगी।
संभावना है कि सरकार जन्म प्रमाणपत्र से जुड़े सभी डाटा को एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल पर लाए और इसमें आधार आधारित वेरिफिकेशन, रियल-टाइम ट्रैकिंग, और डुप्लिकेट एंट्री ब्लॉकर जैसी सुविधाएँ जोड़े।
इसके अलावा, जन्म प्रमाणपत्र जारी करने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय करने, आवेदन की ई-KYC अनिवार्य करने और पुराने रिकॉर्ड की डिजिटल ऑडिट प्रक्रिया तेज करने पर भी विचार किया जा रहा है।
जनता भी इस मुद्दे पर बंटी हुई है—कुछ लोग इसे एक बड़ी प्रशासनिक विफलता मानते हैं, तो कुछ इसे सिस्टम सुधार का मौक़ा बता रहे हैं। पर इतना तय है कि हाई कोर्ट की टिप्पणी ने जन्म प्रमाणपत्र प्रणाली में बड़े बदलावों की नींव रख दी है, जो आने वाले समय में पूरे यूपी में दस्तावेज़ जारी करने के तरीके को बदल सकती है।
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