48 वर्षीय सरबजीत कौर, जो भारत से गुरु नानक जयंती के धार्मिक आयोजनों में शामिल होने के लिए करीब 2,000 सिख तीर्थयात्रियों के दल के साथ पाकिस्तान पहुंचीं, अचानक चर्चा में आ गई हैं। यह मामला इसलिए सुर्खियों में है क्योंकि पाकिस्तान पहुंचने के बाद सरबजीत कौर ने खुद को ‘नूर हुसैन’ बताया। इसके बाद लाहौर हाई कोर्ट के एक अप्रत्याशित आदेश ने राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक स्तर पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। सरहद पार जाकर पहचान का बदलना अपने आप में एक रहस्य बन गया है, जिसे लेकर हर जगह हलचल है।
अदालत का बड़ा आदेश: क्यों देना पड़ा हस्तक्षेप?
लाहौर हाई कोर्ट ने इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत के सामने यह सवाल महत्वपूर्ण बना कि क्या सरबजीत कौर ने अपनी पहचान मजबूरी में बदली है, या फिर यह उनका व्यक्तिगत फैसला है? अदालत ने प्राथमिक जानकारी की समीक्षा के बाद आदेश दिया कि सरबजीत—या नूर हुसैन—के बयान को सुरक्षित और स्वतंत्र माहौल में दर्ज किया जाए, ताकि किसी भी तरह का दबाव या प्रताड़ना की संभावना खत्म हो सके। कोर्ट का यह फैसला दोनों देशों में कानूनी और कूटनीतिक चर्चाओं का कारण बन गया है।
तीर्थयात्रा से विवाद तक: क्या हुआ पाकिस्तान पहुंचने के बाद?
भारत से पाकिस्तान पहुंचते समय सरबजीत कौर एक सामान्य तीर्थयात्री की तरह ही यात्रा में शामिल थीं। पर वहां पहुंचने के बाद परिस्थितियां बदल गईं। सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान में रहने के दौरान उन्होंने यह दावा किया कि वे अब भारत वापस नहीं जाना चाहतीं और ‘नूर हुसैन’ के नाम से नई पहचान के साथ वहीं रहना चाहती हैं। हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि यह फैसला उन्होंने अपनी इच्छानुसार लिया या किसी दबाव में। यह मामला उन कई घटनाओं की याद दिलाता है जब धार्मिक यात्राओं के दौरान कुछ लोग पाकिस्तान में ही बसने का निर्णय ले लेते हैं, लेकिन इस बार पहचान बदलने का मुद्दा केस को और जटिल बना देता है।
भारत-पाक रिश्तों में नई कड़वाहट या नई शुरुआत?
सरबजीत कौर का मामला सिर्फ एक महिला की पहचान का सवाल नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के रिश्तों पर भी असर डाल सकता है। भारत की ओर से इस मामले को गंभीरता से देखने की संभावना है क्योंकि नागरिक की पहचान बदलने के पीछे कई सुरक्षा और कूटनीतिक चिंताएं जुड़ी हो सकती हैं। वहीं पाकिस्तान की अदालत का रुख दर्शाता है कि वे इस मुद्दे को कानूनी रूप से सुलझाने के पक्ष में हैं। अब सबकी नजर उस अंतिम बयान पर है, जो सरबजीत कौर अदालत में देंगी। क्या वह वास्तव में नूर हुसैन के रूप में पाकिस्तान में ही रहना चाहती हैं या यह स्थिति किसी बड़े दबाव का नतीजा है—यह आने वाले दिनों में साफ होगा।
