भारत के साथ बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान ने झेलम में एक बड़े सैन्य अभ्यास का आयोजन कर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई हलचल पैदा कर दी है। ‘राद-उल-फतह’ नाम की इस हाई-इंटेंसिटी वॉर ड्रिल को पाकिस्तान ने अपने सबसे महत्वपूर्ण अभ्यासों में शामिल बताया है। लेकिन इस अभ्यास को चर्चा में लाने का असली कारण था—जॉर्डन के राजा अब्दुल्ला द्वितीय की मौजूदगी। पाक सेना ने न सिर्फ अपनी ताकत का प्रदर्शन किया बल्कि एक बाहरी देश के शीर्ष नेता को इस अभ्यास का हिस्सा बनाकर इसे राजनीतिक संदेश देने का जरिया भी बना दिया।
ड्रिल के दौरान पाकिस्तान ने JF-17 फाइटर जेट से लेकर कोबरा अटैक हेलीकॉप्टर, टैंक और मल्टी-लॉन्च मिसाइल सिस्टम तक सब कुछ उतारा। मिसाइल लॉन्च, बख्तरबंद वाहनों की रफ्तार और जमीनी सैनिकों की ‘लाइव फायरिंग’ ने माहौल को पूरी तरह युद्ध जैसा बना दिया। सोशल मीडिया और रक्षा विश्लेषक इस बात को लेकर विभाजित हैं कि पाकिस्तान का मकसद अपनी सैन्य क्षमता दिखाना था या भारत को अप्रत्यक्ष तौर पर चेतावनी देना। जॉर्डन के राजा की मौजूदगी के कारण यह अभ्यास सामान्य नहीं रहा—यह तेजी से एक रणनीतिक संदेश में बदल गया।
PAK ने दिखाए JF-17, ड्रोन और कोबरा हेलीकॉप्टर
सैन्य विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान की यह ड्रिल सिर्फ एक अभ्यास नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते दबाव और पाकिस्तान की आंतरिक अस्थिरता के बीच एक तरह की ‘पॉवर प्रोजेक्शन’ है। JF-17 थंडर विमानों का लो-लेवल फ्लाईपास, आर्टिलरी फायर और कोबरा हेलीकॉप्टर से एयर स्ट्राइक की नकली कार्रवाई ने ड्रिल को हाई-इंटेंसिटी रूप दिया। पाकिस्तान ने यह भी दिखाया कि उसकी सेना अब ड्रोन वारफेयर में तेजी से निवेश कर रही है, जिसका प्रदर्शन अभ्यास में साफ तौर पर दिखा।
जॉर्डन के राजा की मौजूदगी ने इस ड्रिल को अंतरराष्ट्रीय कवरेज दिला दी। पाकिस्तान चाहता है कि वह अपनी सैन्य क्षमताओं को मध्य-पूर्वी देशों के सामने भी प्रदर्शित करे ताकि रक्षा सहयोग बनाए रख सके। हालांकि भारत में इस अभ्यास को किसी बड़े खतरे के रूप में नहीं देखा जा रहा, लेकिन यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान की कोशिश थी कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर वह अपनी सक्रियता और सामरिक मजबूती दिखा सके। कई विश्लेषक कह रहे हैं कि यह सब एक ‘पॉलिटिकल सिग्नलिंग’ है, जो भारत से ज्यादा पाकिस्तान के घरेलू हालात को ध्यान में रखकर किया गया है।
राद-उल-फतह ड्रिल में युद्ध जैसी स्थितियों का ‘लाइव सिमुलेशन
‘राद-उल-फतह’ एक ऐसा अभ्यास है जिसे पाकिस्तान कई सालों से करता आया है, लेकिन इस बार इसकी टाइमिंग और पैमाना इसे खास बनाते हैं। भारत-पाक के हालिया तनाव, सीमा पर गतिविधियों में वृद्धि और पाकिस्तान की आर्थिक मुश्किलों के समय यह ड्रिल एक राजनीतिक बयान की तरह दिख रही है। अभ्यास में जमीनी सैनिकों ने घुसपैठ, काउंटर-इन्फिल्ट्रेशन, और ‘रियल-टाइम बैटलफील्ड ऑपरेशन’ जैसी स्थितियों का लाइव सिमुलेशन किया।
टैंक फॉर्मेशन्स की मूवमेंट, आर्टिलरी गन्स से लगातार फायर और स्पेशल फोर्सेज की एंटी-टेरर ऑपरेशन मोड में कार्रवाई ने अभ्यास को और हाई-प्रोफाइल बना दिया। कई रक्षा विश्लेषक कह रहे हैं कि पाकिस्तान को डर है कि भारत तेज़ी से आधुनिकिकरण की ओर बढ़ रहा है और ऐसे में अपनी सैन्य छवि बचाने के लिए पाकिस्तान ऐसे अभ्यास करता है। जॉर्डन के राजा की मौजूदगी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समर्थन दिखाना चाहता है—भले ही वास्तविक सैन्य क्षमताओं में कोई बड़ा बदलाव न हो।
भारत ने कहा—‘नज़र रख रहे हैं’…
भारत की प्रतिक्रिया इस पूरी ड्रिल को लेकर काफी संयमित रही है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने कहा है कि वे पाकिस्तान की गतिविधियों पर लगातार नजर रखे हुए हैं और ऐसे अभ्यास किसी भी तरह की चिंता का कारण नहीं हैं। वहीं पाकिस्तान के अंदर ही इस अभ्यास को लेकर सवाल उठने लगे हैं। वहां के नागरिक पूछ रहे हैं कि देश आर्थिक संकट में है, महंगाई रिकॉर्ड स्तर पर है, तो ऐसे महंगे सैन्य अभ्यास का क्या औचित्य है?
सोशल मीडिया पर पाक नागरिकों ने तंज कसा कि “पेट खाली है, लेकिन मिसाइलें भर-भर कर चलाई जा रही हैं।” जबकि सेना समर्थक यूज़र्स का कहना है कि पाकिस्तान को अपनी ताकत दिखानी ही चाहिए। जॉर्डन के राजा की मौजूदगी ने इस बहस को और तेज कर दिया है—कुछ लोग कह रहे हैं कि पाकिस्तान बाहरी समर्थन दिखाकर अपने अंदरूनी संकटों को छिपाना चाहता है।
कुल मिलाकर पाकिस्तान की यह ड्रिल अब सिर्फ एक सैन्य अभ्यास नहीं रही। यह एक राजनीतिक बयानी, एक सामरिक संकेत और एक अंतरराष्ट्रीय संदेश बन गई है—जिसके पीछे कितनी रणनीति है और कितना दिखावा, इसका जवाब आने वाले दिनों में और स्पष्ट होगा।
