मणिपुर में लगभग एक साल तक चले राष्ट्रपति शासन के बाद आखिरकार राज्य को नया नेतृत्व मिल गया है। राष्ट्रपति शासन हटने के कुछ ही घंटों बाद युमनाम खेमचंद सिंह ने मणिपुर के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इस शपथ ग्रहण के साथ ही राज्य की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है। लंबे समय से हिंसा, अस्थिरता और राजनीतिक अनिश्चितता से जूझ रहे मणिपुर के लिए यह फैसला बेहद अहम माना जा रहा है। खेमचंद सिंह मैतेई समुदाय से आते हैं और उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह का करीबी माना जाता है। नई सरकार में सामाजिक संतुलन दिखाने की कोशिश की गई है, जिसके तहत दो उपमुख्यमंत्री भी बनाए गए हैं। नागा समुदाय से लोधी दिखो को डिप्टी सीएम बनाया गया है, जबकि कुकी समुदाय से आने वाली नेमचा किपगेन राज्य की पहली महिला उपमुख्यमंत्री बनी हैं। सरकार के इस स्वरूप को मणिपुर की जटिल सामाजिक संरचना के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हिंसा की पृष्ठभूमि और सत्ता परिवर्तन की कहानी
मणिपुर में मौजूदा हालात की जड़ें 3 मई 2023 की उस हिंसा से जुड़ी हैं, जब चुराचांदपुर में कुकी और मैतेई समुदायों के बीच झड़प हुई थी। इसके बाद हिंसा राज्य के कई हिस्सों में फैल गई और हालात लगातार बिगड़ते चले गए। महीनों तक चले तनाव, आगजनी और जानमाल के नुकसान ने राज्य की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इसी माहौल में तत्कालीन मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह पर दबाव बढ़ा और अंततः उन्हें पद से इस्तीफा देना पड़ा। हालात काबू में न आने पर 12 फरवरी 2025 को मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। राष्ट्रपति शासन के दौरान केंद्र सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व की कमी लगातार महसूस की जाती रही। अब जब राष्ट्रपति शासन हटाया गया है और नई सरकार बनी है, तो लोगों को उम्मीद है कि हालात में सुधार होगा और शांति की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। खास बात यह भी है कि हिंसा के बाद पहली बार दो कुकी-जो विधायक एलएम खौटे और न्गुर्संगलुर सनाते इंफाल पहुंचे हैं, जिसे आपसी संवाद और विश्वास बहाली की दिशा में एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
संगठनकर्ता से मुख्यमंत्री तक, खेमचंद सिंह का राजनीतिक सफर
युमनाम खेमचंद सिंह मणिपुर की राजनीति में कोई नया नाम नहीं हैं। वे 2017 से 2022 तक मणिपुर विधानसभा के अध्यक्ष रह चुके हैं और भाजपा संगठन में एक मजबूत जमीनी नेता के रूप में पहचाने जाते हैं। पार्टी के भीतर उनकी छवि एक कुशल संगठनकर्ता और अनुशासित नेता की रही है। सक्रिय राजनीति में आने से पहले वे व्यवसाय से जुड़े रहे, लेकिन उनकी पहचान सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रही। 2012 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा था, तब वे तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर सिंजामेई सीट से मैदान में उतरे थे और बेहद करीबी मुकाबले में केवल 157 वोटों से हार गए थे। इसके बाद उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया और धीरे-धीरे पार्टी में मजबूत पकड़ बनाई। आरएसएस से उनकी नजदीकियां भी चर्चा में रहीं और वे मणिपुर में संघ की शाखाओं में सक्रिय रूप से हिस्सा लेते रहे। भाजपा संगठन में उनकी लगातार बढ़ती भूमिका और अनुभव को देखते हुए ही पार्टी ने उन्हें मणिपुर की कमान सौंपने का फैसला किया।
ताइक्वांडो से राजनीति तक, अनुशासन से बनी पहचान
युमनाम खेमचंद सिंह का जीवन सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि खेल जगत में भी उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। 54 वर्षीय खेमचंद सिंह एक जाने-माने ताइक्वांडो खिलाड़ी रह चुके हैं। उन्होंने 1977 में ताइक्वांडो की यात्रा शुरू की और करीब 20 वर्षों तक इस खेल में सक्रिय रहे। दक्षिण कोरिया से उन्होंने मार्शल आर्ट्स की विशेष ट्रेनिंग ली और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे भारतीय ताइक्वांडो टीम के कप्तान भी रहे हैं। हाल ही में सियोल स्थित ग्लोबल ट्रेडिशनल ताइक्वांडो फेडरेशन ने उन्हें पारंपरिक ताइक्वांडो में 5वीं डैन ब्लैक बेल्ट से सम्मानित किया, जो उनके लंबे अनुशासन और समर्पण का प्रतीक है। खिलाड़ी के बाद उन्होंने खेल प्रशासक के रूप में भी अहम भूमिका निभाई। वे ताइक्वांडो फेडरेशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष रहे और पूर्वोत्तर भारत में इस खेल के विकास में योगदान दिया। 1982 में असम ताइक्वांडो एसोसिएशन की स्थापना से लेकर भारतीय टीम के कोच बनने तक, उनका सफर प्रेरणादायक रहा है। अब यही अनुशासन और अनुभव वे मणिपुर की राजनीति और प्रशासन में लागू करने की चुनौती के साथ मुख्यमंत्री बने हैं।
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