हरियाणा सरकार ने सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ा एक अहम फैसला लेते हुए राज्य में ‘हरिजन’ और ‘गिरिजन’ शब्दों के आधिकारिक इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगा दी है। सरकार ने साफ निर्देश जारी किए हैं कि अब किसी भी सरकारी पत्राचार, दस्तावेज, आदेश या संवाद में इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाएगा। इस संबंध में हरियाणा के मुख्य सचिव कार्यालय की ओर से 13 जनवरी को एक आधिकारिक पत्र जारी किया गया है, जिसे सभी प्रशासनिक विभागों और संस्थानों को भेजा गया है। सरकार का मानना है कि समय के साथ भाषा और शब्दों की सामाजिक समझ बदलती है और अब इन शब्दों का प्रयोग उचित नहीं माना जाता। यह फैसला राज्य की प्रशासनिक भाषा को संविधान और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
गांधी बनाम आंबेडकर की सोच और शब्दों का विवाद
इतिहास पर नजर डालें तो ‘हरिजन’ शब्द महात्मा गांधी द्वारा अनुसूचित जातियों के लिए इस्तेमाल किया गया था, जिसका अर्थ ‘ईश्वर के लोग’ बताया गया। गांधीजी का उद्देश्य सम्मान देना था, लेकिन डॉ. भीमराव आंबेडकर इस शब्द के प्रयोग के खिलाफ थे। उनका मानना था कि यह शब्द सामाजिक असमानता की वास्तविकता को छिपाता है। आंबेडकर अनुसूचित जातियों के लिए ‘दलित’ शब्द को अधिक उपयुक्त मानते थे, क्योंकि यह समाज में उनके संघर्ष और स्थिति को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। समय के साथ ‘हरिजन’ शब्द को लेकर असहमति और असहजता बढ़ती गई, जिसके चलते कई सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों ने इसे अपमानजनक और पुराने सोच का प्रतीक बताया। हरियाणा सरकार का यह फैसला इसी लंबे वैचारिक विवाद की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है।
संविधान और केंद्र सरकार के निर्देशों का हवाला
सरकार द्वारा जारी पत्र में साफ तौर पर कहा गया है कि भारत का संविधान अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए ‘हरिजन’ या ‘गिरिजन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करता। इसके बजाय संविधान में स्पष्ट रूप से ‘अनुसूचित जाति’ और ‘अनुसूचित जनजाति’ शब्दों का प्रयोग किया गया है। हरियाणा सरकार ने केंद्र सरकार के पुराने दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा है कि आधिकारिक व्यवहार में इन शब्दों के प्रयोग को पहले ही बंद करने के आदेश दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद कुछ विभागों में अब भी पुराने शब्दों का इस्तेमाल हो रहा था, जो नियमों का उल्लंघन माना गया। इसी कारण राज्य सरकार ने दोबारा सख्त निर्देश जारी कर सभी अधिकारियों को पूर्ण पालन सुनिश्चित करने के लिए कहा है।
लापरवाही पर सख्ती, सभी विभागों को चेतावनी
आदेश में यह भी स्वीकार किया गया है कि समीक्षा के दौरान यह सामने आया कि कुछ विभाग केंद्र और राज्य सरकार के निर्देशों का सख्ती से पालन नहीं कर रहे थे। इसके चलते अब सभी प्रशासनिक सचिवों, विभागाध्यक्षों, बोर्ड, निगमों, सार्वजनिक उपक्रमों, संभागीय आयुक्तों, उपायुक्तों, एसडीएम और विश्वविद्यालयों के रजिस्ट्रारों को स्पष्ट चेतावनी दी गई है। सरकार ने कहा है कि भविष्य में सभी आधिकारिक रिकॉर्ड, पत्राचार, नोटशीट और संचार में केवल संवैधानिक रूप से मान्य शब्दों का ही इस्तेमाल किया जाए। यह फैसला न सिर्फ प्रशासनिक सुधार की दिशा में कदम है, बल्कि सामाजिक सम्मान और समानता के संदेश के रूप में भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इस निर्णय से अन्य राज्यों में भी भाषा को लेकर नई बहस और बदलाव की शुरुआत हो सकती है।
