Monday, March 2, 2026
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भारत सरकार ईरान के साथ खड़ी हो? दो मुस्लिम सांसदों के बयान से छिड़ी राजनीतिक जंग

ईरान पर हमले के बाद सपा सांसद मोहिबुल्लाह नदवी और कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के बयानों से सियासी हलचल तेज। जानिए भारत की विदेश नीति और तेल कीमतों पर क्या पड़ सकता है असर।

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ईरान पर अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ गया है। इसी बीच भारत में भी इस मुद्दे पर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। उत्तर प्रदेश के रामपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद Mohibullah Nadvi ने इस घटनाक्रम पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इजरायल ने अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया है। उन्होंने कहा कि दुनिया एक प्रभावशाली धार्मिक नेता की मौत पर शोक मना रही है और यह घटना वैश्विक राजनीति के लिए गंभीर संकेत है। नदवी ने यह भी कहा कि रमजान का महीना चल रहा है, इसलिए लोग सब्र रखे हुए हैं, लेकिन यह सब्र कब तक रहेगा, यह कहना मुश्किल है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह से हमले किए गए, उसमें निर्दोष लोगों की जान गई है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस्लाम को खत्म करने की बात करना बेमानी है, क्योंकि इस्लाम न कभी नष्ट हुआ है और न होगा।

‘भारत अपने दोस्त के साथ खड़ा हो’— कांग्रेस सांसद की अपील

सहारनपुर से कांग्रेस सांसद Imran Masood ने भी ईरान की स्थिति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि भारत और ईरान के ऐतिहासिक संबंध रहे हैं और भारत की विदेश नीति में संतुलन और मित्रता की परंपरा रही है। मसूद ने कहा कि मौजूदा हालात का असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका आर्थिक प्रभाव भारत समेत कई देशों पर पड़ेगा। उन्होंने आशंका जताई कि यदि तनाव लंबा चला तो कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे महंगाई बढ़ेगी और आम लोगों पर बोझ पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जिस तरह से शक्तिशाली देश कार्रवाई कर रहे हैं, वह चिंताजनक है। उनके अनुसार, भारत को अपने कूटनीतिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।

वैश्विक तनाव और संभावित असर

ईरान में शीर्ष नेतृत्व से जुड़ी घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, क्षेत्रीय संघर्ष के चलते ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता पैदा हो गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर हालात बिगड़ते हैं तो वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर हैं, सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह के अंतरराष्ट्रीय संकट घरेलू राजनीति को भी प्रभावित करते हैं। संसद और राजनीतिक मंचों पर इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो सकती है। भारत की विदेश नीति पर भी सवाल उठ रहे हैं कि वह इस संवेदनशील स्थिति में किस तरह संतुलन बनाए रखेगा।

सियासी बयान और बढ़ती बहस

दोनों सांसदों के बयानों के बाद राजनीतिक गलियारों में बहस छिड़ गई है। कुछ लोग इसे मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून के नजरिए से देख रहे हैं, तो कुछ इसे कूटनीतिक संतुलन का मामला बता रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई है। समर्थक इसे नैतिक समर्थन का बयान मान रहे हैं, जबकि आलोचक इसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर जल्दबाजी में की गई टिप्पणी बता रहे हैं। फिलहाल केंद्र सरकार की ओर से इस विषय पर आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र के लिए ऐसे समय में संयमित और संतुलित बयान महत्वपूर्ण होते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह मुद्दा किस दिशा में आगे बढ़ता है।

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