कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा सांसद शशि थरूर एक बार फिर पार्टी की महत्वपूर्ण बैठक से दूर रहे। शुक्रवार को आयोजित कांग्रेस के लोकसभा सांसदों की बैठक में वह नहीं पहुंचे। यह लगातार तीसरी बार है जब उन्होंने पार्टी की बैठक में हिस्सा नहीं लिया। पिछले कुछ महीनों से उनके रुख और कांग्रेस की केंद्रीय नेतृत्व से उनके संबंधों को लेकर राजनीतिक हलचल बनी हुई है। पीएम मोदी की तारीफ करने वाले उनके कई बयानों से भी पार्टी में असहजता की स्थिति पैदा होती रही है। ऐसे में लगातार बैठकों से दूरी उनके भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े कर रही है।
राहुल गांधी की रणनीति बैठक से भी रहे दूर
राहुल गांधी ने 19 दिसंबर को खत्म होने वाले शीतकालीन सत्र के मद्देनज़र पार्टी के सभी 99 लोकसभा सांसदों की बैठक बुलाई थी। इस बैठक में विपक्ष की रणनीति को अंतिम रूप दिया जाना था कि आने वाले दिनों में सरकार को किन मुद्दों पर घेरा जाएगा। लेकिन इतनी अहम बैठक के बावजूद थरूर का गायब रहना पार्टी में चर्चा का विषय बन गया है। दिलचस्प बात यह है कि एक दिन पहले ही उन्होंने एक्स पर बताया था कि वह कोलकाता में हैं, जहाँ अपने पुराने सहयोगी जॉन कोशी की शादी और बहन स्मिता थरूर के जन्मदिन में शामिल होने गए हैं। उन्होंने लिखा कि वह इस दौरान एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भी भाग लेंगे। उनकी गैरहाजिरी को कई नेता संकेत के तौर पर देख रहे हैं कि थरूर और हाई कमान के बीच दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं।
मनीष तिवारी भी नहीं पहुंचे, बढ़ा अटकलों का दौर
इस बैठक से केवल शशि थरूर ही नहीं बल्कि कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी भी गैरहाजिर रहे। मनीष तिवारी भी अक्सर पार्टी लाइन से हटकर बयान देने या सवाल उठाने के कारण चर्चा में रहते हैं। ऐसे में दोनों नेताओं का एक साथ अनुपस्थित रहना कांग्रेस के भीतर असंतुष्ट नेताओं के संभावित समूह की चर्चा को फिर हवा दे रहा है। यह पहला मौका नहीं है जब थरूर ने लगातार मीटिंग मिस की हो। इससे पहले नवंबर में हुई दो बैठकों में भी वह शामिल नहीं हुए थे, जिनमें से एक 30 नवंबर को सोनिया गांधी द्वारा बुलाई गई थी। उस समय उन्होंने सफाई देते हुए कहा था कि वह बैठक छोड़ना नहीं चाहते थे, बल्कि उड़ान देरी की वजह से पहुँच नहीं सके।
पार्टी में पुराना विवाद भी फिर हुआ ताज़ा
अगस्त 2020 का वह विवाद भी इस चर्चा को और तीखा कर देता है, जब शशि थरूर सहित कई नेताओं ने सोनिया गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाए थे। यह समूह बाद में ‘G-23’ के नाम से चर्चित हुआ था। हालांकि थरूर कई मौकों पर साफ कर चुके हैं कि वह पार्टी के प्रति समर्पित हैं, लेकिन हाल की घटनाएँ उनके इरादों और राजनीतिक दिशा को लेकर सवाल खड़े कर रही हैं। कांग्रेस की एकता और मजबूत विपक्ष की छवि बनाने के प्रयासों के बीच शीर्ष नेताओं का बैठकों से दूर रहना पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का कारण बन रहा है। अब देखना होगा कि क्या थरूर इस पर खुलकर सफाई देते हैं या आने वाले महीनों में यह दूरी और बढ़ती हुई दिखाई देगी।
