दिल्ली की आबकारी नीति से जुड़े बहुचर्चित मामले में बड़ा मोड़ तब आया, जब राउज एवेन्यू कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया। इस फैसले के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई। महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के मुखपत्र सामना ने इसे केवल कानूनी जीत नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की राजनीति पर “करारा तमाचा” बताया। सामना के लेख में कहा गया कि अदालत ने साफ कर दिया है कि इस पूरे मामले में कोई आपराधिक साजिश नहीं थी और जिन आरोपों के आधार पर कार्रवाई की गई, वे टिक नहीं पाए। शिवसेना का दावा है कि यह फैसला उन सवालों को और मजबूत करता है, जो जांच एजेंसियों की भूमिका और मंशा पर पहले से उठते रहे हैं।
मोदी–शाह पर सीधा निशाना, जांच एजेंसियों पर गंभीर आरोप
सामना में प्रकाशित लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह पर तीखे शब्दों में हमला बोला गया है। लेख के अनुसार, दिल्ली सरकार की शराब नीति को लेकर आरोप इसलिए लगाए गए क्योंकि वहां जनता द्वारा चुनी गई सरकार भाजपा की नहीं थी। सामना का कहना है कि राजनीतिक असहमति के चलते छापे पड़े, गिरफ्तारियां हुईं और लंबे समय तक नेताओं को जेल में रखा गया। शिवसेना ने यह भी मांग की कि केजरीवाल और सिसोदिया को बेवजह परेशान करने के लिए प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। इसके साथ ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की जांच पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि अदालत ने जांच की खामियों को उजागर कर दिया है, जिससे पूरी कार्रवाई की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
‘राजनीतिक बदले’ का आरोप और महाराष्ट्र का उदाहरण
सामना के लेख में आरोप लगाया गया कि पिछले एक दशक में विपक्षी नेताओं को कमजोर करने के लिए झूठे मामलों का सहारा लिया गया। महाराष्ट्र का हवाला देते हुए कहा गया कि छगन भुजबल, अनिल देशमुख, नवाब मलिक और संजय राऊत जैसे नेताओं को गिरफ्तार किया गया, लेकिन कई मामलों में आज तक ठोस नतीजे सामने नहीं आए। लेख के अनुसार, छगन भुजबल को ढाई साल जेल में रहने के बाद बरी किया गया, जबकि अन्य मामलों में भी जांच एजेंसियां आरोप साबित करने में नाकाम रहीं। शिवसेना का कहना है कि प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई जैसी संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया गया। सामना ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ नेताओं को डर दिखाकर पार्टी बदलने पर मजबूर किया गया, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा।
लोकतंत्र, अदालतें और आगे की सियासत
लेख के आखिरी हिस्से में शिवसेना ने अदालतों और जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए हैं। सामना का कहना है कि अगर समय रहते संस्थाएं सख्ती से काम करतीं, तो “अत्याचार शिविर” जैसी स्थिति पैदा न होती। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का नाम लेते हुए आरोप लगाया गया कि संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी कर राजनीतिक हित साधे गए। शिवसेना ने मांग की कि झूठे मामले गढ़ने वालों को सजा मिलनी चाहिए और जांच एजेंसियों की निष्पक्षता सुनिश्चित की जानी चाहिए। कुल मिलाकर, केजरीवाल और सिसोदिया के बरी होने के बाद यह मामला अब सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में सियासी बहस और टकराव का बड़ा मुद्दा बनता नजर आ रहा है।
