शिवसेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने ईरान-इजरायल युद्ध को लेकर एक बार फिर तीखी प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ में प्रकाशित उनके लेख “कॉकरोच मरते नहीं” ने राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। इस लेख में उन्होंने अमेरिका, इजरायल और वैश्विक राजनीति की रणनीतियों पर सवाल उठाए हैं। साथ ही भारत की भूमिका और चुप्पी को लेकर भी चिंता जताई है। राउत का कहना है कि दुनिया में कई बार युद्ध का इस्तेमाल राजनीतिक और आर्थिक हितों को पूरा करने के लिए किया जाता है। उनके अनुसार आज जो संघर्ष ईरान और इजरायल के बीच दिख रहा है, वह केवल दो देशों का युद्ध नहीं बल्कि वैश्विक ताकतों की राजनीति का हिस्सा है। लेख में यह भी कहा गया है कि इस युद्ध के असर से पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका और इजरायल की नीति पर उठाए सवाल
अपने लेख में संजय राउत ने अमेरिका और इजरायल की नीतियों की आलोचना की है। उन्होंने लिखा कि कई बार शक्तिशाली देश किसी दूसरे देश में हस्तक्षेप को “लोकतंत्र या आजादी” के नाम पर सही ठहराते हैं, लेकिन इसके पीछे असली कारण राजनीतिक और आर्थिक हित होते हैं। राउत ने उदाहरण देते हुए कहा कि इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब बड़े देशों ने किसी क्षेत्र में दखल देकर वहां की स्थिति को बदल दिया। इसी संदर्भ में उन्होंने चीन और तिब्बत का उदाहरण भी दिया और कहा कि 1950 में तिब्बत को आजाद कराने की बात कही गई थी, लेकिन बाद में वह पूरी तरह चीन के नियंत्रण में चला गया। उनके अनुसार आज ईरान के मामले में भी कुछ ऐसी ही रणनीति अपनाई जा रही है। उन्होंने लिखा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू की नीतियों ने इस संघर्ष को और बढ़ावा दिया है।
ईरान को कमजोर समझने की सोच पर टिप्पणी
लेख में संजय राउत ने यह भी कहा कि कई देशों को लगा था कि ईरान को आसानी से कमजोर किया जा सकता है। लेकिन घटनाक्रम ने यह दिखा दिया कि स्थिति इतनी सरल नहीं है। राउत के अनुसार ईरान के कई सैन्य अधिकारी और नेता मारे जाने के बावजूद देश ने जवाब देना जारी रखा। उन्होंने तेल अवीव पर हुए मिसाइल हमलों और खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर खतरे का भी जिक्र किया। लेख में यह भी कहा गया कि युद्ध के दौरान कई देशों के असली हित सामने आ जाते हैं। तेल और ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण को लेकर लंबे समय से वैश्विक ताकतों के बीच संघर्ष चलता रहा है। राउत का मानना है कि यही वजह है कि मध्यपूर्व का क्षेत्र हमेशा अंतरराष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना रहता है। उनके अनुसार इस संघर्ष का असर आने वाले समय में पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और कूटनीति पर पड़ सकता है।
भारत की भूमिका और नेतृत्व पर सवाल
संजय राउत ने अपने लेख के अंतिम हिस्से में भारत की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मध्यपूर्व में बढ़ते तनाव के समय भारत की कूटनीतिक सक्रियता उतनी दिखाई नहीं दी जितनी अपेक्षित थी। लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का भी उल्लेख किया गया और कहा गया कि उन्हें वैश्विक मंच पर एक मजबूत नेता के रूप में पेश किया जाता है, लेकिन इस संकट में भारत की पहल स्पष्ट रूप से सामने नहीं आई। राउत ने यह भी लिखा कि फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री मोदी ने इजरायल का दौरा किया था, जिसके बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया। हालांकि भारत की ओर से इस मुद्दे पर कोई बड़ी पहल दिखाई नहीं दी। लेख के अंत में उन्होंने कहा कि दुनिया की बड़ी ताकतें अक्सर अपने हितों के लिए युद्ध का सहारा लेती हैं, लेकिन ऐसे संघर्षों का असर आम लोगों और वैश्विक शांति पर पड़ता है। इसी संदर्भ में उन्होंने निष्कर्ष देते हुए लिखा कि कुछ ताकतों को लगता है कि वे विरोध को खत्म कर देंगे, लेकिन वास्तविकता यह है कि “कॉकरोच मरते नहीं”, यानी संघर्ष और प्रतिरोध पूरी तरह खत्म नहीं होते।
