आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा एक बार फिर चर्चा में हैं, लेकिन इस बार वजह कोई संसद भाषण या राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि उनका एक बिल्कुल अलग रूप है। राघव चड्ढा ने एक दिन के लिए ऑनलाइन डिलीवरी एजेंट की भूमिका निभाई और खुद स्कूटर चलाकर ऑर्डर डिलीवर करते नजर आए। पीली यूनिफॉर्म, पीठ पर डिलीवरी बैग और चेहरे पर गंभीरता—यह दृश्य सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। राघव चड्ढा ने इस वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा करते हुए लिखा, “बोर्डरूम से दूर, जमीनी हकीकत में. मैंने उनका एक दिन जिया।” इसके साथ ‘स्टे ट्यून्ड’ लिखकर उन्होंने लोगों की जिज्ञासा और बढ़ा दी। वीडियो में वे दूसरे डिलीवरी राइडर्स के साथ अपार्टमेंट्स में जाते, लिफ्ट का इंतजार करते और ग्राहकों के दरवाजे तक खाना पहुंचाते दिखे, जिसने लाखों लोगों का ध्यान खींच लिया।
गिग इकॉनमी की सच्चाई समझने का प्रयास
राघव चड्ढा का यह कदम सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक गहरी सोच और उद्देश्य छिपा था। बीते कुछ समय से वह गिग इकॉनमी से जुड़े डिलीवरी एजेंट्स की समस्याओं को लगातार उठा रहे हैं। उनका मानना है कि जो लोग शहरों में हमारे लिए खाना, किराना और जरूरी सामान पहुंचाते हैं, उनकी मेहनत अक्सर अनदेखी रह जाती है। एक दिन डिलीवरी बॉय बनकर उन्होंने उन्हीं हालात को करीब से देखा, जिनसे रोज हजारों राइडर्स गुजरते हैं—लंबे काम के घंटे, ट्रैफिक का दबाव, समय पर डिलीवरी का तनाव और कम आमदनी। इस अनुभव के जरिए राघव चड्ढा यह समझना चाहते थे कि असल में गिग वर्कर्स की जिंदगी कैसी होती है और नीतियां बनाते समय उनकी परेशानियों को किस तरह गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
एक स्क्रीनशॉट से शुरू हुई बहस
दरअसल, इस पूरे घटनाक्रम की जड़ करीब एक महीने पहले सामने आई थी, जब राघव चड्ढा ने एक डिलीवरी एजेंट की कमाई का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर साझा किया था। उस स्क्रीनशॉट में दिखाया गया था कि एक राइडर ने लगभग 15 घंटे में 28 डिलीवरी कीं, लेकिन बदले में उसे सिर्फ 762 रुपये के आसपास भुगतान मिला। हिसाब लगाया जाए तो प्रति घंटे की कमाई करीब 52 रुपये बैठती है। राघव चड्ढा ने इस पोस्ट के साथ लिखा था कि कम मजदूरी, भारी टारगेट, नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं और सम्मान की कमी—यही आज के गिग वर्कर्स की सच्चाई है। इस पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई। कई लोगों ने डिलीवरी प्लेटफॉर्म्स की नीतियों पर सवाल उठाए, तो कई गिग वर्कर्स ने अपने अनुभव साझा किए। यह मुद्दा सिर्फ ऑनलाइन चर्चा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नीति और कानून की जरूरत पर भी बात शुरू हुई।
सड़क से संसद तक उठी आवाज
राघव चड्ढा ने सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित न रहकर इस मुद्दे को संसद तक पहुंचाया। उन्होंने राज्यसभा में जोमैटो, स्विगी और ब्लिंकइट जैसे प्लेटफॉर्म्स से जुड़े राइडर्स और डिलीवरी एजेंट्स की समस्याओं को उठाया। उनका कहना है कि भारत की डिजिटल इकॉनमी कम वेतन पाने वाले और असुरक्षित हालात में काम करने वाले लोगों की मेहनत पर खड़ी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने गिग वर्कर्स के लिए न्यूनतम वेतन, इंसानी काम के घंटे, बीमा और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाओं की जरूरत पर जोर दिया। इसी क्रम में उन्होंने डिलीवरी बॉय हिमांशु के साथ बैठकर बातचीत और लंच करते हुए एक लंबा वीडियो भी साझा किया, जिसमें जोखिम, थकान और भविष्य की अनिश्चितता जैसे मुद्दों पर खुलकर चर्चा हुई। राघव चड्ढा का मानना है कि जब तक नीति निर्माता खुद जमीनी सच्चाई नहीं देखेंगे, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा।
