कारगिल युद्ध 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक ऐसा समय था, जब दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर था। इस दौरान पाकिस्तान की सेना ने दबे पांव चोटियों पर कब्जा कर लिया था। अमेरिका तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के नेतृत्व में युद्ध को रोकने के लिए दबाव बना रहा था। क्लिंटन ने भारत और पाकिस्तान दोनों को शांति के लिए प्रेरित किया। उन्होंने अपनी आत्मकथा “My Life” में इस जंग और अटल बिहारी वाजपेयी संग हुई बातचीत का जिक्र किया है।
पाकिस्तान ने दी थी परमाणु धमकी
पाकिस्तानी सेना की हार सुनिश्चित होने के बाद, उन्होंने परमाणु हथियारों की धमकी दी। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियार अलर्ट पर रखे थे। इस खबर ने वाशिंगटन में क्लिंटन के माथे पर शिकन ला दी। अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से संपर्क किया और युद्ध रोकने की गुहार लगाई। इस बीच भारत की सेना घुसपैठियों को हर हाल में निकालने के लिए तैयार थी।
अटल का साहसिक और स्पष्ट जवाब
अमेरिकी दबाव के बीच, अटल बिहारी वाजपेयी ने क्लिंटन से कहा, “मिस्टर क्लिंटन, मैं अपनी आधी आबादी खोने को तैयार हूं, लेकिन पाकिस्तान कल सुबह का सूरज नहीं देख पाएगा।” उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत LOC पार नहीं करेगा, लेकिन घुसपैठियों को हर हाल में समाप्त किया जाएगा। इस जवाब ने अमेरिकी राष्ट्रपति को सन्न कर दिया और तत्काल पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ को वाशिंगटन बुलाने का रास्ता खोल दिया।
नवाज शरीफ की अमेरिका दौड़ और भारत की विजय
अटल के कड़े रुख के बाद, नवाज शरीफ 4 जुलाई 1999 को अमेरिका पहुंचे और क्लिंटन से मुलाकात की। शांति और तनाव कम करने की बातचीत के बाद उन्होंने वापसी की घोषणा की। भारत ने 26 जुलाई 1999 को कारगिल विजय की घोषणा कर पूरी दुनिया को अपनी सैन्य रणनीति और साहस का परिचय दिया। अटल बिहारी वाजपेयी की निर्णय क्षमता और साहस ने न केवल भारत की सीमा की रक्षा की, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की ताकत भी प्रदर्शित की।
