UP Politics: उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर बयानबाज़ी तेज हो गई है। ने समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख Akhilesh Yadav पर तीखा हमला बोला है। मामला कांशीराम जयंती और सपा द्वारा ‘पीडीए दिवस’ मनाने की घोषणा से जुड़ा है, लेकिन इसके बहाने बसपा सुप्रीमो ने सपा के पुराने फैसलों, गठबंधन की यादों और नाम बदलने की राजनीति तक कई मुद्दे उठा दिए। उनके बयान के बाद राज्य में राजनीतिक हलचल तेज होना तय माना जा रहा है। खासकर दलित, पिछड़ा और मुस्लिम वोट बैंक को लेकर दोनों दलों के बीच बयानबाज़ी आने वाले समय में और बढ़ सकती है।
कांशीराम जयंती पर ‘राजनीतिक दिखावा’ का आरोप**
बसपा प्रमुख Mayawati ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि सपा का चाल, चरित्र और चेहरा हमेशा से ही दलित, पिछड़े वर्ग और बहुजन समाज के प्रति सम्मानजनक नहीं रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा द्वारा कांशीराम जयंती के मौके पर ‘पीडीए दिवस’ मनाने की घोषणा केवल राजनीतिक नाटक है। मायावती ने कहा कि जिन लोगों का इतिहास बहुजन महापुरुषों के सम्मान से जुड़ा नहीं रहा, वे अब वोट की राजनीति के लिए उनके नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं।
Mayawati ने यह भी कहा कि सपा का अतीत दलितों और कमजोर वर्गों के साथ अन्याय से भरा रहा है। उनके अनुसार, बहुजन समाज में जन्मे संतों, गुरुओं और महापुरुषों के सम्मान की बात करने वाली सपा ने अपने शासनकाल में कई ऐसे फैसले लिए, जिनसे समाज में नाराजगी बढ़ी। मायावती ने इशारों में कहा कि जनता अब सब समझती है और केवल प्रतीकात्मक आयोजनों से भरोसा नहीं किया जा सकता।
1993 गठबंधन और 1995 गेस्ट हाउस कांड का जिक्र
मायावती (Mayawati) ने अपने बयान में 1993 के सपा-बसपा गठबंधन की भी याद दिलाई। उस समय Mulayam Singh Yadav मुख्यमंत्री थे और गठबंधन सरकार बनी थी। मायावती ने आरोप लगाया कि गठबंधन के दौरान दलितों पर अत्याचार रोकने की शर्त के बावजूद हालात नहीं बदले। उन्होंने कहा कि हालात ऐसे बने कि 1 जून 1995 को बसपा को समर्थन वापस लेना पड़ा।
इसके अगले दिन हुए लखनऊ गेस्ट हाउस कांड का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि वह घटना इतिहास में दर्ज है और उसे भुलाया नहीं जा सकता। मायावती ने संकेत दिया कि उस दौर की कड़वाहट आज भी खत्म नहीं हुई है। उनके बयान से साफ है कि बसपा एक बार फिर पुराने राजनीतिक अध्यायों को सामने लाकर सपा को घेरने की रणनीति अपना रही है।
जिलों और संस्थानों के नाम बदलने का मुद्दा
बसपा सुप्रीमो (Mayawati) ने अखिलेश यादव का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि उनकी सरकार ने बहुजन नायक Kanshi Ram के नाम पर बने जिलों और संस्थानों के नाम बदले। उन्होंने कहा कि जब बसपा सरकार ने कासगंज को ‘कांशीराम नगर’ के रूप में पहचान दी, तो सपा सरकार ने सत्ता में आते ही उसका नाम बदल दिया। इसी तरह संत रविदास नगर और उर्दू-फारसी-अरबी विश्वविद्यालय के नाम बदलने का भी जिक्र किया गया।
मायावती (Mayawati) का कहना है कि यह सब कदम बहुजन समाज के सम्मान के खिलाफ थे। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर सपा सच में कांशीराम का सम्मान करती है तो फिर उनके नाम से जुड़े संस्थानों और योजनाओं को क्यों बदला गया? इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि कांशीराम के निधन पर सपा सरकार ने राजकीय शोक तक घोषित नहीं किया, जो बहुजन समाज के लिए पीड़ा का विषय है।
सपा-भाजपा रिश्तों पर भी साधा निशाना
अपने बयान के अंतिम हिस्से में मायावती (Mayawati) ने आरोप लगाया कि सपा की राजनीति ने कई बार भाजपा को फायदा पहुंचाया। उन्होंने कहा कि भड़काऊ राजनीति और जातीय तनाव के माहौल ने भाजपा को मजबूत होने का मौका दिया। उनके अनुसार, यूपी की राजनीति में सपा और भाजपा एक-दूसरे की जरूरत बन गए हैं, जबकि इसका नुकसान बहुजन और मुस्लिम समाज को उठाना पड़ा है।
मायावती (Mayawati) ने बहुजन समाज से सावधान रहने की अपील करते हुए कहा कि वोट देते समय इतिहास को नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि बसपा ही वह पार्टी है जो सर्वसमाज को साथ लेकर चलने की नीति पर काम करती है। इस बयान के बाद अब सपा की ओर से जवाब का इंतजार है। साफ है कि यूपी में आगामी चुनावों से पहले दलित और पिछड़ा वोट बैंक को लेकर राजनीतिक घमासान तेज होने वाला है।
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