बिहार चुनाव 2025 में भोजपुरी सिनेमा के बड़े चेहरों के मैदान में उतरने ने पूरे प्रदेश में चर्चा का नया दौर पैदा कर दिया था। खेसारी लाल यादव की एंट्री को लेकर माहौल शुरू से गर्म था। ज्योति सिंह और रितेश पांडेय ने भी स्टार पावर के दम पर बड़ी सभाएँ कीं। लेकिन जब मतगणना के शुरुआती राउंड सामने आए, तो तस्वीर उम्मीदों से बिल्कुल अलग दिखी। वोटों की गिनती में तीनों स्टार उम्मीदवार अपनी-अपनी सीटों पर पिछड़ते दिखाई दिए।
चुनावों में भीड़ जुटना और वोट में तब्दील होना दो अलग बातें होती हैं, और इस बार यही फर्क साफ दिखाई दिया।
खेसारी लाल यादव: स्टारडम से आगे नहीं बढ़ पाई रणनीति
खेसारी लाल यादव ने चुनावी दौरे में हर उस इलाक़े में पहुँच बनाई, जहाँ उनकी फिल्मों और गानों का बड़ा फैनबेस है। उनकी जनसभाओं में युवाओं की भारी भीड़ नजर आई, लेकिन इन भीड़ों का असर वोटिंग में नजर नहीं आया। खेसारी के सामने पारंपरिक रूप से मजबूत और स्थानीय स्तर पर जुड़ा हुआ उम्मीदवार खड़ा था। चुनाव के आखिरी चरणों में जातीय समीकरणों ने भी बड़ा रोल निभाया। क्षेत्र में पहले से मौजूद राजनीतिक नेटवर्क और जमीनी कार्यकर्ताओं की टीम ने मुकाबला और कठिन बना दिया। मतगणना के शुरुआती राउंड में ही यह साफ हो गया कि खेसारी को उम्मीद के मुकाबले काफी कम वोट मिले हैं और बढ़त हासिल करना उनके लिए चुनौती बन चुका है।
ज्योति सिंह: स्टार परिवार का प्रभाव भी पर्याप्त नहीं पड़ा
फिल्म स्टार पवन सिंह की पत्नी और पहली बार मैदान में उतरीं ज्योति सिंह को भी अच्छी-खासी उम्मीदें थीं। उन्होंने अपने प्रचार को आधुनिक तरीके से डिजाइन किया था और युवा वोटरों पर फोकस किया था।
लेकिन रुझानों ने साफ कर दिया कि सिर्फ नाम और पहचान चुनावी जीत की गारंटी नहीं बनते। ज्योति सिंह के सामने मैदान में ऐसे उम्मीदवार खड़े थे, जो अपने क्षेत्र में वर्षों से सामाजिक और राजनीतिक रूप से सक्रिय थे। महिला वोटरों और युवाओं पर उनकी पकड़ मजबूत दिखाई देने की उम्मीद थी, लेकिन स्थानीय समीकरणों और प्रतिद्वंदियों की मजबूत पकड़ की वजह से वे मतगणना में शुरू से ही पिछड़ती रहीं।
रितेश पांडेय: ग्राउंड वर्क की कमी भारी पड़ी?
रितेश पांडेय का चुनावी अंदाज भी बाकी भोजपुरी स्टार्स जैसा ही दिखा — रोड शो, रैलियाँ और युवा भीड़। उन्होंने सोशल मीडिया पर लगातार अपडेट दिए और खुद को युवा चेहरे के रूप में पेश किया। लेकिन चुनावी मैदान में सोशल मीडिया उतना बड़ा फैक्टर साबित नहीं हुआ, जितना स्थानीय संपर्क और बूथ मैनेजमेंट रहा। रितेश को उम्मीद थी कि संगीत और स्टार पहचान उन्हें बढ़त दिलाएगी, मगर क्षेत्रीय मुद्दों और स्थानीय उम्मीदवारों की लंबे वक्त की सक्रियता निर्णायक साबित हुई। गिनती के रुझानों में वे लगातार पीछे बने हुए हैं और अंतर इतना अधिक है कि वापसी की संभावना लगभग खत्म मानी जा रही है।
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