महाराष्ट्र की राजनीति इन दिनों असमंजस, आशंकाओं और अचानक लिए जा रहे बड़े फैसलों के दौर से गुजर रही है। डिप्टी सीएम अजित पवार के दुखद निधन के बाद जिस तेजी से घटनाक्रम बदला, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एनसीपी के दोनों गुटों—शरद पवार और अजित पवार खेमे—के बीच विलय की बातचीत चल रही थी, तब भाजपा ने इतनी जल्दबाजी में फैसले क्यों लिए? क्या यह सिर्फ संवेदनात्मक फैसला था या इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक रणनीति छिपी है?
शोक के बीच शपथ और राज्यसभा की तैयारी
28 जनवरी को अजित पवार का प्लेन क्रैश में निधन होता है। 29 जनवरी को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार और 30 जनवरी को उनके बेटों द्वारा अस्थि विसर्जन। अभी परिवार और पार्टी शोक से उबर भी नहीं पाई थी कि 31 जनवरी की शाम अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम पद की शपथ दिला दी जाती है। इसके अगले ही दिन सूत्रों के हवाले से खबर आती है कि अजित पवार के बेटे जय पवार को राज्यसभा भेजने की तैयारी है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भाजपा ने जय पवार के नाम पर सहमति जताई है, लेकिन पार्थ पवार पर साफ तौर पर आपत्ति रखी है। पार्थ पवार पर पहले से लगे आरोपों को इसकी वजह बताया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि जब शरद पवार और अजित पवार गुट के बीच विलय को लेकर सकारात्मक बातचीत चल रही थी और 12 फरवरी के बाद किसी बड़े फैसले की संभावना जताई जा रही थी, तब भाजपा ने दो-तीन दिनों के भीतर इतने अहम राजनीतिक फैसले क्यों कर दिए?
क्या BJP को NCP के मर्जर से डर है?
राजनीतिक जानकारों की मानें तो भाजपा की सबसे बड़ी चिंता एनसीपी का एकजुट होना है। अगर शरद पवार और अजित पवार का गुट एक हो जाता, तो महाराष्ट्र की राजनीति में एक बेहद मजबूत विपक्ष खड़ा हो सकता था। अलग-अलग रहने पर अजित पवार का गुट भाजपा के साथ रहता है, जिससे सत्ता संतुलन भाजपा के पक्ष में बना रहता है। लेकिन मर्जर की स्थिति में पूरी ताकत शरद पवार के हाथ में चली जाती, जिन्हें साधना भाजपा के लिए आसान नहीं होता।
डिजिटल एडिटर प्रशांत अरुण जाधव का कहना है कि दोनों गुटों के बीच बातचीत नई नहीं थी। पहले भी ऐसे वीडियो सामने आ चुके हैं, जिनमें शरद पवार और अजित पवार साथ बैठे दिखे। खुद शरद पवार यह कह चुके हैं कि अजित की इच्छा थी कि दोनों गुट एक हो जाएं। ऐसे में भाजपा की जल्दबाजी इस बात का संकेत हो सकती है कि वह किसी भी कीमत पर एनसीपी को एक मंच पर नहीं आने देना चाहती।
सुनेत्रा पवार की शपथ और शरद पवार की अनभिज्ञता
सुनेत्रा पवार को जिस तेजी से डिप्टी सीएम बनाया गया, उस पर खुद शरद पवार ने हैरानी जताई और कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी। आमतौर पर इतनी बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारी परिवार और पार्टी में व्यापक चर्चा के बाद तय होती है, लेकिन यहां ऐसा होता नहीं दिखा। इससे यह संदेश गया कि भले ही शोक की घड़ी में पूरा परिवार साथ दिख रहा हो, लेकिन राजनीतिक तौर पर दोनों गुटों के बीच दूरी अब भी कायम है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम जानबूझकर उठाया गया ताकि एनसीपी के दोनों गुटों के बीच संभावित एकता पर विराम लगाया जा सके। अगर सच में शरद पवार को इस फैसले की जानकारी नहीं थी, तो यह दरार को और गहरा करने की रणनीति भी हो सकती है। भाजपा के लिए यह जरूरी है कि अजित पवार का गुट अलग पहचान बनाए रखे, भले ही नेतृत्व अब परिवार के अन्य सदस्यों के हाथ में क्यों न चला जाए।
शिंदे फैक्टर, BMC की लड़ाई और BJP की बड़ी रणनीति
इस पूरे घटनाक्रम में एक और अहम नाम है—एकनाथ शिंदे। अजित पवार के निधन के बाद यह चर्चा तेज हो गई थी कि शिंदे को भाजपा की ओर से साधने का काम अक्सर अजित पवार करते थे। शिंदे को एक “टफ बार्गेनर” माना जाता है, जो आसानी से किसी सौदे पर राजी नहीं होते। खासकर बीएमसी मेयर पद को लेकर जिस तरह की खींचतान चल रही थी, उससे भाजपा पर दबाव बढ़ सकता था।
ऐसे में भाजपा चाहती है कि उसके पास अजित पवार गुट का समर्थन बना रहे, ताकि शिंदे पर निर्भरता कम हो और सरकार के पास पर्याप्त नंबर रहें। अगर एनसीपी के दोनों गुट एक हो जाते, तो भाजपा की यह रणनीतिक बढ़त खत्म हो सकती थी। इसलिए जल्दबाजी में लिए गए ये फैसले—चाहे सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम बनाना हो या जय पवार को राज्यसभा भेजने की तैयारी—भाजपा की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा माने जा रहे हैं, जिसका मकसद महाराष्ट्र की सियासत में शक्ति संतुलन अपने पक्ष में बनाए रखना है।
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