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नीतीश के करीबी हरिवंश नारायण सिंह की पहली बार संसद में एंट्री, पत्रकारिता से राजनीति तक का रोमांचक सफर

Harivansh Narayan Singh का सफर पत्रकारिता से बैंक नौकरी और राजनीति तक, राज्यसभा उपसभापति बनने की कहानी और नीतीश कुमार के बेहद करीबी होने के अनकहे पहलू।

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Harivansh Narayan Singh: हरिवंश नारायण सिंह (Harivansh Narayan Singh) का जन्म 30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा गांव के नज़दीकी स्कूल से शुरू की और 1971 में जेपी इंटर कॉलेज, सेवाश्रम से हाईस्कूल पास किया। इसके बाद वाराणसी पहुंचे और यूपी कॉलेज से इंटरमीडिएट किया। ग्रेजुएशन काशी हिंदू विश्वविद्यालय से पूरा करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता में डिप्लोमा हासिल किया। करियर की शुरुआत टाइम्स ग्रुप में की, फिर बैंक ऑफ इंडिया में 1981-84 तक हैदराबाद और पटना में नौकरी की। 1984 में पत्रकारिता में वापस लौटे और आनंद बाजार पत्रिका समूह में सहायक संपादक बने।

पत्रकारिता और नीतीश के करीबी बनना

1990 के दशक में Harivansh Narayan Singh बिहार के प्रमुख मीडिया समूह प्रभात खबर से जुड़े, जहाँ उन्होंने 2 दशक से अधिक समय तक काम किया। इसी दौरान उनका संपर्क नीतीश कुमार से हुआ और दोनों काफी करीब आए। नीतीश के भरोसे के चलते उन्हें जेडीयू का महासचिव बनाया गया। पत्रकारिता और राजनीतिक समझ के इस मिश्रण ने Harivansh Narayan Singh को पार्टी में मजबूत स्थिति दिलाई और भविष्य में राज्यसभा के लिए नामांकित होने का रास्ता खुला।

पहली बार संसद और उपसभापति का सफर

2014 में Harivansh Narayan Singh को जेडीयू ने राज्यसभा के लिए नामांकित किया। इसी के साथ वे पहली बार संसद पहुँचे। अप्रैल 2014 से अब तक राज्यसभा के दो कार्यकाल पूरे कर चुके हैं। 9 अगस्त 2018 को उन्हें राज्यसभा के उपसभापति चुना गया, जिसका कार्यकाल 9 अप्रैल 2020 तक रहा। फिर 14 सितंबर 2020 को दोबारा उपसभापति बने और आज तक इस पद पर कार्यरत हैं। उनके इस सफर में पत्रकारिता की तेज नजर और राजनीतिक समझ ने उन्हें एक प्रभावशाली नेता बनाया।

नीतीश के बेहद करीबी और संवैधानिक फैसले

Harivansh Narayan Singh नीतीश कुमार के बेहद करीबी माने जाते हैं। 2018 में जब उन्हें उपसभापति बनाने का प्रस्ताव आया, तो नीतीश ने पूरी तरह समर्थन किया। 2022 में जेडीयू के महागठबंधन में जाने के दौरान भी हरिवंश ने संवैधानिक पद का हवाला देकर इस्तीफा देने से इनकार किया, जिससे वे विपक्ष और बीजेपी दोनों की नजरों में रहे। नए संसद भवन के उद्घाटन में उन्होंने हिस्सा लिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना की। ये दर्शाता है कि हरिवंश ने राजनीतिक और संवैधानिक विवेक के साथ अपने पद को निभाया और पार्टी व सरकार दोनों में संतुलन बनाए रखा।

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