उत्तर प्रदेश में चुनावी साल के चलते राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इसी बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने प्रदेश सरकार पर बिजली के प्रीपेड स्मार्ट मीटर को लेकर बड़ा हमला बोला है। अखिलेश यादव ने कहा कि बीजेपी सरकार के कहर की वजह से प्रदेश में एक नई पीड़ित श्रेणी बन गई है, जिसे उन्होंने नाम दिया – ‘प्रीपेड पीड़ित’।
उन्होंने कहा कि स्मार्ट मीटर की खामियों के कारण लाखों लोग बिजली कट जाने पर अंधेरे और गर्मी में परेशान होने को मजबूर हैं। सपा प्रमुख ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि प्रीपेड मीटर लगाने के बावजूद आम जनता लगातार बिजली संकट और परेशानियों का सामना कर रही है। उनका आरोप है कि सरकार और बिजली कंपनियों की मिलीभगत के कारण जनता दर‑दर भटक रही है, जबकि कंपनियों को पहले ही पैसा मिल चुका होता है।
जनता दर‑दर भटकने को मजबूर
अखिलेश यादव ने कहा कि जब बिजली का पैसा पहले ही जमा हो जाता है, तो फिर सरकार और बिजली कंपनियों को जनता की चिंता क्यों करनी चाहिए? उन्होंने आरोप लगाया कि बेचारी जनता दर‑दर भटकने को मजबूर है, लेकिन उनके सामने कोई सुनवाई नहीं हो रही क्योंकि कंपनियां और सरकार पहले से ही पैसा लेकर बैठी हैं।
सपा नेता ने यह भी कहा कि प्रीपेड मीटर की वजह से अब जनता उपभोक्ता नहीं, उपभुगता बन गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जनता अब केवल बीजेपी सरकार के हेराफेरी और दुष्परिणामों को भुगतने के लिए मजबूर है। यही कारण है कि ‘प्रीपेड पीड़ित’ नाम से नई पीड़ित श्रेणी लगातार बढ़ रही है।
पीड़ितों की आवाज़ और सपा का संदेश
अखिलेश यादव ने कहा कि पीड़ित अब सपा के पीडीए (प्रीपेड पीड़ित असोसिएशन) में जुड़े हैं और उन्होंने जनता को भरोसा दिलाया कि बुरे दिन जानेवाले हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव में उनकी सरकार बनने पर हर व्यक्ति को नियमित और सस्ती बिजली मिलेगी।
सपा प्रमुख का यह बयान प्रदेश में चुनावी माहौल को और गरम कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार ने बिजली प्रीपेड मीटर के नाम पर लोगों को परेशान करके सत्ता की सुरक्षा सुनिश्चित की है। अखिलेश यादव का यह अभियान मुख्य रूप से जनता की रोजमर्रा की समस्याओं पर केंद्रित है और इसे लोकप्रियता बढ़ाने वाला मुद्दा माना जा रहा है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
बिजली के प्रीपेड मीटर के मुद्दे पर सपा के हमले के बाद सोशल मीडिया और स्थानीय जनता में बहस तेज़ हो गई है। कई लोग अखिलेश यादव के बयान का समर्थन कर रहे हैं और इसे जनता के दर्द की आवाज़ बता रहे हैं। वहीं बीजेपी समर्थक इसे राजनीतिक प्रचार और चुनावी जुमला बता रहे हैं।
चुनावी माहौल में यह मुद्दा मतदाताओं की चिंता और आम जिंदगी के अनुभव से जुड़ा होने के कारण महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। आगामी महीनों में यह विवाद उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों पर भी असर डाल सकता है।
