मुंबई में 15 जनवरी को होने वाले बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव ने एक बार फिर शहर की सियासत को गरमा दिया है। इस बार चर्चा का केंद्र बने हैं अंडरवर्ल्ड डॉन रहे अरुण गवली, जिनकी दो बेटियां गीता गवली और योगिता गवली भायखला इलाके से चुनावी मैदान में उतरी हैं। भायखला वही इलाका है जिसे कभी गवली गिरोह का अभेद्य किला माना जाता था। दगड़ी चाल से निकलकर अंडरवर्ल्ड में पहचान बनाने वाले गवली का नाम आज भी मुंबई के आपराधिक इतिहास में दर्ज है। उनकी बेटियों का चुनाव लड़ना सिर्फ एक पारिवारिक फैसला नहीं, बल्कि मुंबई की उस सियासत की याद दिलाता है जहां अपराध, राजनीति और सत्ता की सीमाएं अक्सर धुंधली रही हैं। गवली समर्थकों का कहना है कि बेटियां सामाजिक काम के इरादे से मैदान में हैं, जबकि विरोधी इसे पुराने प्रभाव को दोबारा ज़िंदा करने की कोशिश बता रहे हैं।
बाल ठाकरे का भरोसा और फिर टूटा रिश्ता
अरुण गवली का नाम उस दौर में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे के बेहद करीबियों में लिया जाता था। 1995 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान बाल ठाकरे का वह बयान आज भी सुर्खियों में रहता है, जिसमें उन्होंने कहा था— “उनके पास दाऊद है तो हमारे पास गवली है।” उस समय यह बयान कांग्रेस नेताओं पर अंडरवर्ल्ड से रिश्तों के आरोपों की पृष्ठभूमि में दिया गया था। ठाकरे के इस बयान ने गवली को राजनीतिक संरक्षण का एहसास दिलाया। लेकिन यही रिश्ता ज्यादा समय तक नहीं टिका। 1995 में शिवसेना-बीजेपी सरकार बनने के करीब दो साल बाद हालात बदलने लगे। सत्ता में अपनी पसंद की सरकार होने के बाद गवली को लगा कि अब मुंबई के अंडरवर्ल्ड में उसका वर्चस्व बिना रोक-टोक चलेगा। यहीं से बाल ठाकरे और गवली के बीच मतभेद बढ़े और दोस्ती दुश्मनी में बदल गई।
सत्ता का भ्रम और अंडरवर्ल्ड का खूनी दौर
सरकार में समर्थन का अहसास गवली गिरोह के लिए आत्मविश्वास नहीं, बल्कि बेखौफी बन गया। 90 के दशक के मध्य में मुंबई अंडरवर्ल्ड हिंसा, उगाही और खुलेआम हत्याओं का गवाह बना। गवली गिरोह ने न सिर्फ प्रतिद्वंद्वी गैंग्स के लोगों को निशाना बनाया, बल्कि व्यापारियों से जबरन वसूली और धमकी जैसे अपराधों को भी बढ़ा दिया। हालात इतने बिगड़े कि पुलिस कमिश्नर ऑफिस के पास ही एक मशहूर कपड़ा व्यापारी की हत्या कर दी गई। इस घटना ने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया। मीडिया और विपक्ष ने राज्य सरकार पर कानून-व्यवस्था पूरी तरह फेल होने के आरोप लगाए। केंद्र सरकार तक ने महाराष्ट्र सरकार से जवाब तलब किया। गवली को जिस सत्ता का सहारा लग रहा था, वही उसके लिए मुश्किलें खड़ी करने लगी।
एनकाउंटर रणनीति और राजनीति की ओर मोड़
खराब होती छवि और बढ़ते दबाव के बीच सरकार ने सख्त रुख अपनाया। मुंबई पुलिस ने एनकाउंटर की रणनीति शुरू की, जिसके तहत बड़े-बड़े शूटर कथित मुठभेड़ों में मारे जाने लगे। गवली गिरोह भी इस कार्रवाई से अछूता नहीं रहा। उसके कई करीबी शूटर पुलिस एनकाउंटर में मारे गए, जिससे गवली को यह साफ संदेश मिल गया कि सत्ता का संरक्षण अब उसके साथ नहीं है। इसी दौर में गवली ने खुलकर राजनीति की राह पकड़ी और खुद को सामाजिक नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की। आज, जब उसकी बेटियां बीएमसी चुनाव लड़ रही हैं, तो यह सवाल फिर उठ रहा है कि क्या यह सिर्फ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी है या मुंबई की उस पुरानी कहानी का नया अध्याय, जहां अपराध और राजनीति का रिश्ता हमेशा चर्चा में रहा है।
