Monday, February 2, 2026
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सरकार और संगठन की अलग-अलग प्राथमिकताएँ: क्या चुनावी सालों में यही बनती है सबसे बड़ी चुनौती?

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चुनावी साल आते ही सरकार पर एक अलग तरह का दबाव बन जाता है। सत्ता में बैठी सरकार की पहली जिम्मेदारी प्रशासन चलाना, योजनाओं को ज़मीन पर उतारना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना और ऐसे फैसले लेना होती है जिनसे आम जनता को सीधा संदेश जाए कि सरकार काम कर रही है। मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों और अधिकारियों तक की सोच इसी दायरे में सिमट जाती है। योजनाओं के उद्घाटन, समीक्षा बैठकें, बजट आवंटन और अफसरशाही की सक्रियता सरकार की प्राथमिक सूची में सबसे ऊपर होती है। लेकिन इसी दौरान एक खतरा भी पैदा होता है—सरकार का पूरा ध्यान सिस्टम और फाइलों पर टिक जाता है, जबकि पार्टी का कैडर खुद को हाशिये पर महसूस करने लगता है। कई बार कार्यकर्ताओं को लगता है कि सत्ता तो उनकी मेहनत से आई, लेकिन फैसलों में उनकी आवाज़ नहीं सुनी जा रही। यही भावना धीरे-धीरे अंदरूनी असंतोष का रूप ले लेती है, जो चुनावी समय में सरकार के लिए सिरदर्द बन सकती है।

संगठन की अपेक्षा: कार्यकर्ता की भूमिका और सम्मान

दूसरी तरफ संगठन की सोच सरकार से बिल्कुल अलग होती है। संगठन का मानना है कि चुनाव जीतने की असली ताकत योजनाओं से ज्यादा ज़मीनी कार्यकर्ता होता है। बूथ स्तर पर काम करने वाला कार्यकर्ता, जो गली-मोहल्ले में पार्टी का चेहरा होता है, वही वोटर को जोड़ता है। संगठन चाहता है कि कार्यकर्ताओं को न सिर्फ जिम्मेदारी मिले, बल्कि सम्मान और भागीदारी भी महसूस हो। टिकट बंटवारे से लेकर कार्यक्रमों की रूपरेखा तक, संगठन की कोशिश रहती है कि कैडर को सक्रिय रखा जाए। लेकिन जब सरकार अपने फैसलों में संगठन से दूरी बना लेती है, तब कार्यकर्ता खुद को सिर्फ पोस्टर लगाने और भीड़ जुटाने तक सीमित महसूस करने लगता है। यही वह मोड़ होता है जहां संगठन और सरकार की प्राथमिकताएँ आमने-सामने खड़ी दिखने लगती हैं। संगठन के लिए यह सवाल अहम होता है कि अगर कार्यकर्ता संतुष्ट नहीं है, तो चुनावी मशीनरी कैसे चलेगी।

संतुलन बिगड़ते ही जन्म लेता है अंदरूनी असंतोष

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, चुनावी सालों में सरकार और संगठन के बीच संतुलन साधना सबसे कठिन काम होता है। अगर सरकार पूरी तरह प्रशासनिक मोड में चली जाए और संगठन को नजरअंदाज करे, तो भीतर ही भीतर असंतोष पनपने लगता है। यह असंतोष खुलकर सामने नहीं आता, लेकिन इसका असर चुनावी तैयारियों में दिखता है। कहीं बूथ कमजोर पड़ते हैं, कहीं कार्यकर्ता निष्क्रिय हो जाते हैं, तो कहीं गुटबाजी सिर उठाने लगती है। वहीं अगर संगठन का दबाव जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए, तो सरकार के फैसलों पर सवाल उठने लगते हैं और प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होता है। यही वजह है कि चुनाव से पहले कई दलों में नेतृत्व स्तर पर बैठकों का दौर तेज हो जाता है, ताकि सरकार और संगठन के बीच तालमेल बनाया जा सके। यह एक ऐसा नाजुक संतुलन है, जिसमें थोड़ी सी चूक पूरी रणनीति को कमजोर कर सकती है।

हर पार्टी, हर राज्य की साझा चुनौती

यह सवाल किसी एक पार्टी या एक राज्य तक सीमित नहीं है। चाहे राष्ट्रीय दल हों या क्षेत्रीय, सत्ता में आते ही हर जगह सरकार और संगठन की प्राथमिकताओं में फर्क दिखने लगता है। चुनावी साल इस फर्क को और साफ कर देते हैं। जनता को लुभाने के लिए सरकार योजनाओं और फैसलों का सहारा लेती है, जबकि संगठन को भरोसा होता है कि मजबूत कैडर के बिना कोई भी लहर टिकाऊ नहीं होती। यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि चुनाव जीतना जितना जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी है सरकार और संगठन के बीच भरोसे की डोर को मजबूत रखना। जिस पार्टी ने यह संतुलन साध लिया, वही चुनावी परीक्षा में आगे निकल जाती है। और जो इसमें चूक गई, उसके लिए सत्ता की राह और भी कठिन हो जाती है।

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