पूर्व सेना प्रमुख MM Naravane की आत्मकथा को लेकर उठे विवाद के बीच रक्षा मंत्री Rajnath Singh ने पहली बार खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने उन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें दावा किया गया था कि सेना से जुड़े अधिकारियों को रिटायरमेंट के 20 साल बाद तक कोई किताब लिखने की अनुमति नहीं होगी। रक्षा मंत्री ने स्पष्ट कहा कि ऐसा कोई नियम लागू नहीं किया गया है और पूर्व सेना प्रमुखों या वरिष्ठ अधिकारियों पर सामान्य तौर पर लेखन को लेकर कोई व्यापक प्रतिबंध नहीं है।
रक्षा मंत्री के इस बयान को इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ दिनों से यह मुद्दा राजनीतिक और सैन्य हलकों में चर्चा का केंद्र बना हुआ था। यह विवाद तब और बढ़ गया जब संसद के बजट सत्र में इस विषय को विपक्ष ने जोर-शोर से उठाया। कई रिपोर्ट्स में यह संकेत दिया गया कि सरकार सेना से जुड़े अधिकारियों की पब्लिक कमेंट्री और किताबों पर सख्त नियंत्रण चाहती है, लेकिन अब रक्षा मंत्री ने साफ कर दिया है कि 20 साल की रोक जैसी बात पूरी तरह भ्रामक है।
हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में संवेदनशील जानकारी को सार्वजनिक करने से पहले निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है। यानी किताब लिखने पर रोक नहीं, लेकिन सुरक्षा से जुड़ी सूचनाओं पर नियम जरूर लागू होंगे।
संसद में हंगामा: राहुल गांधी ने उठाए सवाल
जनरल नरवणे की पुस्तक को लेकर संसद में उस वक्त बवाल मच गया जब कांग्रेस सांसद Rahul Gandhi ने सरकार से सवाल किया कि आखिर इस किताब को छपने की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार महत्वपूर्ण तथ्यों को सामने आने से रोक रही है। इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली और सत्र के संचालन में भी बाधा आई।
विवाद की जड़ में वह आत्मकथा है, जिसका शीर्षक ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’ बताया गया है। यह किताब उस दौर पर आधारित है जब साल 2020 में भारत और चीन के बीच गलवान घाटी में तनाव चरम पर था। 15-16 जून 2020 की रात हुई झड़प के दौरान जनरल नरवणे भारतीय सेना के प्रमुख थे। उस समय की रणनीतिक बैठकों, निर्णयों और सैन्य तैयारी से जुड़ी जानकारियां पुस्तक में शामिल होने की खबरें सामने आईं।
संसद में यह सवाल भी उठा कि क्या ऐसी जानकारी सार्वजनिक डोमेन में आनी चाहिए, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से सीधे जुड़ी हो। विपक्ष का तर्क था कि अगर पुस्तक में कोई आपत्तिजनक बात है तो सरकार स्पष्ट करे, लेकिन पूरी किताब रोक देना पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है। वहीं सरकार की ओर से कहा गया कि प्रक्रिया के तहत समीक्षा की जा रही है।
किताब में क्या है? गलवान से लेकर उच्च स्तरीय बैठकों तक का जिक्र
सूत्रों के मुताबिक जनरल नरवणे की आत्मकथा में Galwan Valley में हुई झड़प और उसके बाद चीन के साथ चले लंबे सैन्य और कूटनीतिक संवाद का विस्तृत विवरण दिया गया है। बताया जा रहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री S. Jaishankar और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval के साथ हुई बैठकों और बातचीत का भी उल्लेख किया है।
किताब में कथित तौर पर कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) और चाइना स्टडी ग्रुप (CSG) की बैठकों का भी जिक्र है। इसके अलावा, उन्होंने अपने अधीनस्थ कमांडरों को दिए गए निर्देश, रणनीतिक निर्णयों की पृष्ठभूमि और सीमावर्ती इलाकों में सैनिक तैनाती से जुड़े पहलुओं को भी विस्तार से लिखा है। यही वे हिस्से हैं, जिन्हें लेकर रक्षा मंत्रालय के भीतर संवेदनशीलता जताई गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि सैन्य रणनीति, ऑपरेशनल निर्देश और उच्च स्तरीय सुरक्षा बैठकों से जुड़े विवरण सार्वजनिक होने पर भविष्य की रणनीतियों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, कुछ पूर्व सैन्य अधिकारियों का यह भी कहना है कि आत्मकथाओं के माध्यम से इतिहास दर्ज होता है और इससे आम लोगों को महत्वपूर्ण घटनाओं की समझ मिलती है। इसी संतुलन को लेकर विवाद गहराया हुआ है।
रक्षा मंत्रालय की आपत्ति: ओएसए और आर्मी एक्ट के तहत समीक्षा
विवाद के बीच रक्षा मंत्रालय ने सीधे जनरल नरवणे को नहीं, बल्कि पुस्तक प्रकाशित करने वाले पब्लिशिंग हाउस को तलब किया। उनसे किताब का पूरा ड्राफ्ट मांगा गया ताकि यह जांचा जा सके कि कहीं इसमें ऐसी जानकारी तो नहीं है, जो Official Secrets Act (OSA) या आर्मी एक्ट के प्रावधानों का उल्लंघन करती हो। सूत्रों के अनुसार, इसी वजह से अप्रैल 2024 में प्रस्तावित प्रकाशन को अब तक अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी है।
सरकारी सूत्रों का कहना है कि किसी भी पूर्व या वर्तमान सैन्य अधिकारी द्वारा लिखी गई पुस्तक, जिसमें सेवा काल की घटनाओं का उल्लेख हो, उसे तय प्रक्रिया के तहत पूर्व स्वीकृति लेनी होती है। यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया जाता है। वहीं, जनरल नरवणे के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने अपने अनुभव साझा किए हैं और कोई गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किया है।
अब रक्षा मंत्री के ताजा बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि किताब लिखने पर 20 साल की रोक जैसी कोई नीति लागू नहीं की गई है। लेकिन साथ ही यह भी साफ है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों पर सरकार कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि समीक्षा प्रक्रिया पूरी होने के बाद जनरल नरवणे की किताब को हरी झंडी मिलती है या इसमें संशोधन की शर्त रखी जाती है।

