उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर वंदे मातरम विवाद को लेकर माहौल गरमा गया है। विधानसभा में बोलते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि कुछ लोग वंदे मातरम गाने से इनकार कर रहे हैं, जबकि इसी देश में रहकर उसका लाभ उठाते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग बाबर की कब्र में सजदा का समर्थन करते हैं और वंदे मातरम का विरोध करते हैं। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कुछ सांसदों के बयान सामने आए हैं, जिनमें वंदे मातरम गाने से इनकार किया गया। उन्होंने विपक्षी दलों से पूछा कि क्या वे ऐसे बयानों का समर्थन करते हैं या उनका विरोध करेंगे। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई पार्टी अपने भीतर अनुशासन लागू करती है तो उसे यह तय करना चाहिए कि वंदे मातरम का अपमान करने वालों पर सख्त कार्रवाई हो। उनके इस बयान के बाद सदन में कुछ देर के लिए हंगामे जैसे हालात भी बने, लेकिन मुख्यमंत्री अपने रुख पर कायम रहे।
‘हिंदुस्तान का खाएंगे, वंदे मातरम नहीं गाएंगे’ बयान पर सियासी घमासान
मुख्यमंत्री ने कहा कि कुछ नेता खुले तौर पर कह रहे हैं कि वे वंदे मातरम नहीं गाएंगे। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि “हिंदुस्तान का खाएंगे लेकिन वंदे मातरम नहीं गाएंगे” जैसी मानसिकता देशहित में ठीक नहीं है। उन्होंने विपक्ष से आग्रह किया कि यदि वे सच में राष्ट्रहित की बात करते हैं तो ऐसे बयानों की निंदा करें। मुख्यमंत्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में वंदे मातरम का अपमान स्वीकार नहीं किया जा सकता, उसी तरह अन्य दलों को भी अपने यहां स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। उन्होंने यहां तक कहा कि जो व्यक्ति वंदे मातरम का विरोध करे, उसे पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया जाना चाहिए। इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज हो गई है। विपक्षी दलों की ओर से भी प्रतिक्रिया आने लगी है, हालांकि कई नेताओं ने इसे राजनीतिक बयानबाजी बताया है। लेकिन साफ है कि वंदे मातरम विवाद अब सिर्फ सांस्कृतिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है।
सदन के आचरण और प्रदेश की छवि पर भी उठाए सवाल
सीएम योगी ने अपने संबोधन में केवल वंदे मातरम तक ही बात सीमित नहीं रखी, बल्कि सदन के आचरण और प्रदेश की छवि पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि प्रदेश की छवि अचानक खराब नहीं हुई थी, बल्कि कुछ लोगों के आचरण की वजह से हालात बिगड़े थे। उन्होंने कहा कि ऐसा माहौल था जिसमें बेटियां असुरक्षित महसूस करती थीं और व्यापारी अपना कारोबार समेटने को मजबूर होते थे। मुख्यमंत्री ने विपक्ष की ओर इशारा करते हुए कहा कि अभिभाषण के दौरान भी जिस तरह का व्यवहार दिखा, वह स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने मशहूर शायर गालिब की पंक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि कई बार लोग अपनी गलती नहीं देखते और दूसरों को दोष देते रहते हैं। मुख्यमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि विपक्ष के कुछ सदस्य नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं, जिससे सदन की गरिमा प्रभावित होती है। उन्होंने साफ कहा कि लोकतंत्र में बहस जरूरी है, लेकिन अनुशासन और मर्यादा भी उतनी ही जरूरी है।
सनातन, परंपरा और राष्ट्रभाव पर जोर
अपने संबोधन के अंत में मुख्यमंत्री ने सनातन धर्म और भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस देश की संस्कृति हजारों वर्षों पुरानी है। उन्होंने महर्षि वेदव्यास का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने वेदों को लिपिबद्ध कर आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान सुरक्षित किया। मुख्यमंत्री का कहना था कि राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना हर नागरिक का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम केवल एक गीत नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की प्रेरणा रहा है। ऐसे में इसका विरोध करना सही संदेश नहीं देता। उनके बयान के बाद राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्ष इस मुद्दे पर क्या रणनीति अपनाता है। फिलहाल इतना तय है कि वंदे मातरम विवाद ने एक बार फिर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा दे दी है और सदन में हुई यह बहस लंबे समय तक चर्चा में रहने वाली है।
