महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है। डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे द्वारा शुरू किए गए ‘ऑपरेशन तुतारी’ को लेकर अचानक आई खबरों ने सियासी गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यह ऑपरेशन दरअसल विपक्षी दलों के सांसदों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश माना जा रहा था, जिससे आने वाले लोकसभा चुनावों में ताकत बढ़ाई जा सके। लेकिन अब खबर है कि BJP नेतृत्व ने इस पूरे अभियान पर फिलहाल रोक लगा दी है। सूत्रों के मुताबिक, शिंदे को साफ संकेत दिया गया है कि वे सीधे तौर पर विपक्षी सांसदों को तोड़ने की कोशिश न करें। इससे यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या यह फैसला रणनीतिक है या गठबंधन के भीतर संतुलन बनाए रखने की कोशिश।
12 सांसदों पर नजर, 19 का लक्ष्य
बताया जा रहा है कि इस ऑपरेशन के तहत शिंदे की नजर करीब 12 सांसदों पर थी, जिनमें 6 राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) और 6 शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के सांसद शामिल बताए जा रहे थे। अगर यह योजना सफल होती, तो शिंदे गुट के सांसदों की संख्या 7 से बढ़कर 19 तक पहुंच सकती थी। इस संख्या के साथ शिंदे गुट लोकसभा चुनाव 2029 में ज्यादा सीटों पर दावा करने की स्थिति में आ सकता था। यही वजह है कि इस ऑपरेशन को काफी अहम माना जा रहा था। हालांकि, BJP के ‘रेड सिग्नल’ के बाद यह पूरा प्लान फिलहाल ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि BJP बिना अपनी रणनीतिक मंजूरी के ऐसा बड़ा कदम उठाने के पक्ष में नहीं है।
बीजेपी की शर्तें और नई रणनीति
सूत्रों के अनुसार, बीजेपी ने शिंदे को यह सलाह दी है कि अगर विपक्षी दलों के नेता या सांसद महायुति में शामिल होना चाहते हैं, तो उन्हें सीधे शिंदे गुट में लाने के बजाय दूसरे सहयोगी गुटों के माध्यम से लाया जाए। इससे गठबंधन के भीतर संतुलन बना रहेगा और किसी एक नेता की ताकत अचानक ज्यादा नहीं बढ़ेगी। यह भी कहा जा रहा है कि BJP फिलहाल किसी बड़े राजनीतिक फेरबदल से बचना चाहती है, खासकर तब जब केंद्र और राज्य दोनों जगह गठबंधन की सरकार है। इसके अलावा, यह भी चर्चा में है कि हाल ही में दिल्ली दौरे के दौरान शीर्ष नेतृत्व के साथ शिंदे की मुलाकात नहीं हो पाई, जिससे यह संकेत मिलता है कि पार्टी इस मुद्दे पर अभी सावधानी से आगे बढ़ रही है।
क्यों बदल सकते हैं सांसदों के रुख?
विपक्षी दलों के कुछ सांसदों में असंतोष की स्थिति बनी हुई है। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं, जैसे विकास कार्यों के लिए पर्याप्त फंड न मिलना, भविष्य को लेकर अनिश्चितता, और सत्ता से दूरी। इसके उलट, महायुति के साथ जुड़ने पर उन्हें केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर सहयोग मिलने की उम्मीद रहती है। साथ ही, मौजूदा राजनीतिक माहौल में पार्टी और चुनाव चिन्ह का महत्व कुछ हद तक कम होता नजर आ रहा है, जबकि सत्ता और संसाधनों तक पहुंच ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है। यही वजह है कि ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि आने वाले समय में फिर से इस तरह के ऑपरेशन की चर्चा हो सकती है, लेकिन फिलहाल BJP के रुख ने इस सियासी समीकरण को रोक दिया है।
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