तेल की कीमतों में बड़ा उछाल! क्या महंगा होगा पेट्रोल-डीजल? वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिया जवापश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच वैश्विक तेल बाजार में अचानक उथल-पुथल देखने को मिली है। ईरान से जुड़े हालिया घटनाक्रम और अमेरिका-इजरायल के सैन्य हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चार साल बाद पहली बार क्रूड ऑयल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई और कुछ समय के लिए यह करीब 114 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई। इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता और तेल आपूर्ति से जुड़े संभावित जोखिम बताए जा रहे हैं। खास तौर पर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को लेकर बढ़ती चिंता ने ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। दुनिया के बड़े तेल उत्पादक देशों का अधिकांश निर्यात इसी मार्ग से होता है, इसलिए यदि यहां किसी तरह की रुकावट आती है तो उसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह स्थिति
भारत जैसे देशों के लिए यह संकट अधिक संवेदनशील माना जा रहा है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। अनुमान के अनुसार भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग 85 से 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है। यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने के साथ-साथ परिवहन लागत भी बढ़ सकती है। इसका असर रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई दर में तेजी आने का खतरा रहता है। हालांकि सरकार का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों पर नजर रखी जा रही है और आवश्यक होने पर आर्थिक स्तर पर कदम उठाए जा सकते हैं।
वित्त मंत्री का बयान: महंगाई पर सीमित असर
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल को लेकर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने कहा कि फिलहाल देश में जरूरी वस्तुओं की कीमतें अपेक्षाकृत स्थिर हैं, इसलिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का महंगाई पर बहुत अधिक असर पड़ने की संभावना नहीं है। उनके अनुसार पिछले एक वर्ष के दौरान भारतीय क्रूड बास्केट की कीमतों में सामान्य रूप से गिरावट का रुख देखा गया था। फरवरी के अंत में इसकी कीमत करीब 69 डॉलर प्रति बैरल थी, जो हालिया तनाव के बाद बढ़कर 80 डॉलर से अधिक तक पहुंच गई। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सरकार वैश्विक घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है और यदि जरूरत पड़ी तो उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। वित्त मंत्री का मानना है कि फिलहाल देश की अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में है और किसी भी बाहरी झटके से निपटने की क्षमता रखती है।
वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान से जुड़ी हालिया घटनाओं ने पूरे क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति को और जटिल बना दिया है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त सैन्य हमलों के बाद ईरान में नेतृत्व परिवर्तन की खबरें भी सामने आई हैं, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया है। इसी बीच ईरान की ओर से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को बंद करने की संभावित चेतावनी ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ा दी है। खाड़ी क्षेत्र के कुछ तेल निर्यातक देशों ने सुरक्षा कारणों से अपने शिपमेंट में कटौती की घोषणा भी की है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक असर पड़ सकता है। फिलहाल भारत सहित कई देश स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि क्षेत्र में जल्द स्थिरता लौटेगी, जिससे तेल बाजार में भी संतुलन कायम हो सकेगा।
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