आज के दौर में आम आदमी की सुबह पेट्रोल और डीजल की कीमतों को देखने से शुरू होती है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उतार-चढ़ाव और युद्ध जैसी स्थितियों के बीच भारत में ईंधन के दाम हमेशा चर्चा का विषय रहते हैं। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में की गई 10 रुपये की कटौती ने तेल कंपनियों को तो राहत दी है, लेकिन आम जनता के मन में आज भी यह सवाल कौंध रहा है कि आखिर हम जो तेल खरीदते हैं, उसमें सरकार की कमाई कितनी है? क्या आप जानते हैं कि यदि सरकार पेट्रोल-डीजल से टैक्स हटा दे, तो आपको यह किस भाव में मिलेगा? आइए, आंकड़ों के इस गणित को आसान भाषा में समझते हैं।
टैक्स का मायाजाल: रिफाइनरी से आपकी टंकी तक का सफर
जब कच्चा तेल विदेशों से जहाजों के जरिए भारत आता है, तो इसे रिफाइनरी में साफ किया जाता है। रिफाइनरी से निकलने के बाद पेट्रोल का जो ‘बेस प्राइस’ होता है, वह आपकी सोच से कहीं कम है। आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली जैसे शहर में जो पेट्रोल आपको करीब ₹95 प्रति लीटर मिलता है, उसका बेस प्राइस और रिफाइनिंग चार्ज मिलाकर लागत लगभग ₹55 से ₹60 के आसपास बैठती है। लेकिन जैसे ही यह तेल रिफाइनरी से बाहर निकलता है, इस पर केंद्र सरकार की ‘एक्साइज ड्यूटी’ और राज्य सरकार का ‘वैट’ (VAT) लग जाता है। इसके अलावा पेट्रोल पंप डीलर का अपना कमीशन भी इसमें जुड़ता है। यही कारण है कि जो तेल रिफाइनरी में सस्ता होता है, वह आपकी गाड़ी की टंकी तक पहुंचते-पहुंचते दोगुना महंगा हो जाता है।
केंद्र और राज्य की कमाई: किसका कितना हिस्सा?
पेट्रोल-डीजल पर लगने वाला टैक्स दो हिस्सों में बंटा होता है। केंद्र सरकार इस पर एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) वसूलती है, जिसमें बेसिक ड्यूटी, एडिशनल एक्साइज ड्यूटी और कृषि सेस शामिल होता है। आंकड़ों को देखें तो पेट्रोल पर केंद्र सरकार करीब ₹11.90 से ₹21.90 (बदलावों के अनुसार) तक एक्साइज ड्यूटी वसूलती है। वहीं, राज्य सरकारें अपना वैट (VAT) लगाती हैं, जो दिल्ली में पेट्रोल पर लगभग ₹15.40 और डीजल पर ₹12.83 के आसपास है। इसके साथ ही, प्रति लीटर पेट्रोल पर डीलर को लगभग ₹3.50 से ₹4.50 का कमीशन मिलता है। अगर हम इन सब को जोड़ दें, तो सीधे तौर पर एक लीटर तेल की कीमत का लगभग 40 से 45 फीसदी हिस्सा केवल टैक्स और कमीशन के रूप में सरकारी खजाने और डीलर्स के पास जाता है।
बिना टैक्स के कितने में मिलेगा एक लीटर तेल?
अब कल्पना कीजिए कि अगर सरकार पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले सभी तरह के टैक्स (एक्साइज ड्यूटी और वैट) को खत्म कर दे, तो क्या होगा? अगर तेल को टैक्स-फ्री कर दिया जाए, तो दिल्ली में ₹95 में बिकने वाला पेट्रोल आपको मात्र ₹55 से ₹60 के बीच मिल सकता है। इसी तरह, डीजल की कीमतें भी गिरकर ₹50 से ₹55 के दायरे में आ जाएंगी। हालांकि, सरकार के लिए ऐसा करना मुमकिन नहीं है क्योंकि देश के बुनियादी ढांचे, सड़क निर्माण, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी योजनाओं के लिए फंड का एक बड़ा हिस्सा इसी पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले ‘रोड एंड इंफ्रास्ट्रक्चर सेस’ से आता है। यही वजह है कि ईंधन को अब तक जीएसटी (GST) के दायरे से बाहर रखा गया है, ताकि सरकारें अपनी जरूरत के हिसाब से राजस्व जुटा सकें।
एक्साइज ड्यूटी में कटौती
हाल ही में सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर स्पेशल एक्साइज ड्यूटी में ₹10 की कटौती की है। इस फैसले के बाद पेट्रोल पर प्रभावी एक्साइज ड्यूटी घटकर करीब ₹11.90 और डीजल पर ₹7.8 रह गई है। हालांकि, इस कटौती का सीधा लाभ आम जनता की जेब को नहीं मिला, लेकिन इसने महंगाई की आग को बढ़ने से जरूर रोका है। दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम ₹70 से बढ़कर ₹100 प्रति बैरल के पार जाने से तेल कंपनियों को प्रति लीटर भारी नुकसान हो रहा था। सरकार की इस कटौती ने कंपनियों के उस घाटे को कम किया है, जिससे कंपनियों को तेल के दाम बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ी। यानी भले ही कीमतें घटी नहीं, लेकिन सरकार के इस कदम ने इन्हें बढ़ने से रोककर जनता को एक ‘अप्रत्यक्ष राहत’ जरूर दी है।
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