1 मार्च, 2026 को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन की खबर ने पूरी दुनिया को दो धड़ों में बांट दिया है। जहां एक ओर पश्चिम के कई देशों में जश्न का माहौल है, वहीं भारत में इस मुद्दे पर एक नई सियासी जंग छिड़ गई है। देश का विपक्ष लगातार मांग कर रहा है कि भारत सरकार को औपचारिक रूप से शोक संवेदना व्यक्त करनी चाहिए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस मामले पर एक सोची-समझी चुप्पी साध रखी है। भारत ने न तो किसी तरह का आधिकारिक शोक संदेश जारी किया है और न ही तेहरान की ओर संवेदना के हाथ बढ़ाए हैं। सरकार की इस चुप्पी ने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। दरअसल, नई दिल्ली का यह रुख केवल वर्तमान स्थिति का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे दशकों पुरानी कूटनीति, राष्ट्रीय हित और मध्य-पूर्व के बदलते समीकरण छिपे हुए हैं।
इतिहास के पन्ने: जब परमाणु समझौते और धमकियों ने बिगाड़े रिश्ते
भारत और ईरान के रिश्तों में आई इस कड़वाहट और सावधानी के पीछे इतिहास का एक बड़ा हिस्सा है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, यह कोई पहली बार नहीं है जब भारत ने ईरान से दूरी बनाई हो। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान, जब अमेरिका के साथ परमाणु समझौते की बातचीत चल रही थी, तब भारत ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) में 2005, 2006 और 2009 में तीन बार ईरान के खिलाफ मतदान किया था। उस वक्त तेहरान ने भारत पर दबाव बनाने के लिए 1 लाख करोड़ रुपये के एलएनजी (LNG) सौदे को रद्द करने की सीधी धमकियां दी थीं। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत हमेशा से अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों को ऊपर रखता आया है। खामेनेई के निधन पर भारत का वर्तमान रुख इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और ईरान के पिछले ‘ब्लैकमेलिंग’ वाले व्यवहार की याद दिलाता है।
वैश्विक प्रतिक्रिया: जश्न, तिरस्कार और खाड़ी देशों का ‘मौन’
खामेनेई की मौत पर दुनिया भर से आ रही प्रतिक्रियाएं बेहद तीखी हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन्हें इतिहास के सबसे दुष्ट लोगों में से एक बताया है, जबकि इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इसे ‘न्याय’ करार दिया है। जी7 देशों में से किसी ने भी इस मौत पर दुख नहीं जताया है। सबसे दिलचस्प रुख उन मुस्लिम देशों का रहा है, जो भारत के करीबी सहयोगी हैं और जहां लाखों भारतीय काम करते हैं। सऊदी अरब ने इस पूरे मामले पर चुप्पी साध ली है, जबकि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने तेहरान में अपना दूतावास बंद कर राजदूत को वापस बुला लिया है। ओआईसी (OIC) के 57 सदस्यों में से केवल 10 से कम देशों ने शोक व्यक्त किया है, जिनमें रूस, चीन, पाकिस्तान और तुर्की जैसे देश शामिल हैं। ऐसे में भारत का चुप रहना उसके उन अरब मित्रों की भावनाओं के अनुरूप है, जो मध्य-पूर्व में शांति और स्थिरता चाहते हैं।
कूटनीतिक संतुलन: क्यों नई दिल्ली के लिए चुप्पी ही सबसे अच्छा विकल्प?
भारत के लिए इस वक्त चुप्पी साधना एक मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। एक तरफ भारत के अमेरिका और इजरायल के साथ गहरे रणनीतिक संबंध हैं, तो दूसरी तरफ खाड़ी देश भारत की ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। ईरान के सर्वोच्च नेता का शासन अक्सर विवादों, कट्टरपंथ और क्षेत्रीय अस्थिरता के आरोपों से घिरा रहा है। ऐसे में किसी भी प्रकार का ‘राजकीय शोक’ घोषित करना भारत के उन सहयोगियों को नाराज कर सकता था जो ईरान को आतंकवाद और अस्थिरता का मुख्य स्रोत मानते हैं। सरकार ने केवल क्षेत्रीय तनाव को कम करने और संयम बरतने की अपील की है, जो यह दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर किसी के दबाव में आए बिना अपनी ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ (Independent Foreign Policy) पर चल रहा है।
भविष्य की राह: क्या बदलेंगे भारत-ईरान संबंध?
खामेनेई के बाद अब सबकी नजरें ईरान के अगले नेतृत्व पर हैं। क्या नया नेतृत्व भारत के साथ पुराने आर्थिक रिश्तों को फिर से पटरी पर ला पाएगा या तनाव और बढ़ेगा? भारत के लिए चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा आपूर्ति जैसे प्रोजेक्ट्स महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे किसी एक नेता के निधन से रुकने वाले नहीं हैं। विपक्ष भले ही इसे ‘नैतिक हार’ बता रहा हो, लेकिन रणनीतिकारों का मानना है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत का यह ‘संयमित मौन’ भविष्य में उसे एक बेहतर मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर सकता है। फिलहाल, भारत सरकार की प्राथमिकता मध्य-पूर्व में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षा और वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता सुनिश्चित करना है, न कि किसी विवादित तानाशाह के निधन पर शोक मनाना।
