Monday, February 16, 2026
Homeदेश108 फुट ऊंची, सोने जैसी चमक और तपस्या की मुद्रा… अक्षरधाम में...

108 फुट ऊंची, सोने जैसी चमक और तपस्या की मुद्रा… अक्षरधाम में खड़ी ये दिव्य प्रतिमा आखिर किस महान संत की है?

दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर परिसर में 108 फुट ऊंची नीलकंठ वर्णी की भव्य प्रतिमा सबका ध्यान खींच रही है। जानिए इस दिव्य प्रतिमा का इतिहास, महत्व, अनावरण की तैयारी और स्वामीनारायण के जीवन से जुड़ी पूरी कहानी।

-

देश की राजधानी नई दिल्ली में स्थित अक्षरधाम मंदिर पहले से ही अपनी भव्य वास्तुकला और आध्यात्मिक वातावरण के लिए जाना जाता है, लेकिन इन दिनों यहां एक नई दिव्य रचना लोगों को चौंका रही है। मंदिर परिसर में स्थापित की जा रही 108 फुट ऊंची नीलकंठ वर्णी की विशाल प्रतिमा अब लगभग तैयार नजर आ रही है, जिसकी सुनहरी चमक दूर से ही दिखाई देती है। बताया जा रहा है कि यह प्रतिमा इतनी ऊंची है कि अक्षरधाम के पास से गुजरने वाले फ्लाईओवर से भी साफ नजर आएगी। तपस्या की मुद्रा में खड़ी यह प्रतिमा एक पैर पर संतुलन बनाकर, दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाए हुए है, जो गहन साधना और आत्मसंयम का प्रतीक मानी जाती है। फिलहाल प्रतिमा का औपचारिक अनावरण नहीं हुआ है, लेकिन आधार और आसपास के निर्माण कार्य तेजी से पूरे किए जा रहे हैं। श्रद्धालु और पर्यटक रोजाना इस प्रतिमा को देखने के लिए मंदिर परिसर में रुककर निहारते नजर आ रहे हैं।

मार्च में हो सकता है अभिषेक, तैयारी जोरों पर

मंदिर प्रशासन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, नीलकंठ वर्णी की इस विशाल प्रतिमा का विधिवत अभिषेक और पूजा समारोह इसी साल मार्च महीने तक आयोजित किए जाने की संभावना है। हालांकि अभी आधिकारिक तारीख की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन निर्माण और सजावटी कार्यों की रफ्तार देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि तैयारी अंतिम चरण में है। यह प्रतिमा न सिर्फ आकार में भव्य है, बल्कि इसकी कारीगरी और भाव-भंगिमा भी लोगों को गहरे तक प्रभावित कर रही है। खास बात यह है कि युवा संत की तपस्या मुद्रा नेपाल के मुक्तिनाथ में किए गए कठिन साधना काल से प्रेरित बताई जा रही है। इस मुद्रा में नीलकंठ वर्णी ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में आत्मसंयम और साधना का मार्ग अपनाया था। मंदिर से जुड़े संतों का मानना है कि यह प्रतिमा आने वाली पीढ़ियों को त्याग, धैर्य और सनातन मूल्यों का संदेश देगी।

किशोर नीलकंठ से स्वामीनारायण बनने की यात्रा

अक्षरधाम में स्थापित होने वाली यह प्रतिमा भगवान स्वामीनारायण के किशोर काल को दर्शाती है, जब लोग उन्हें नीलकंठ वर्णी के नाम से जानते थे। मात्र 11 वर्ष की आयु में उन्होंने उत्तर प्रदेश में स्थित अपना घर छोड़ दिया था। कमर में केवल एक वस्त्र बांधकर, बिना किसी साधन के उन्होंने सात वर्षों तक पैदल यात्रा की। इस दौरान उन्होंने भारत, नेपाल, तिब्बत, भूटान और बांग्लादेश जैसे देशों में हजारों किलोमीटर की दूरी तय की। बेहद कम भोजन और पानी में जीवन व्यतीत करते हुए उन्होंने कई पवित्र तीर्थ स्थलों के दर्शन किए। इस यात्रा का उद्देश्य केवल भ्रमण नहीं था, बल्कि आत्मज्ञान, तपस्या और जीवन के गहरे सत्य को समझना था। नीलकंठ वर्णी जहां-जहां गए, वहां उन्होंने लोगों को करुणा, संयम और सत्य का मार्ग दिखाया। अक्षरधाम की यह प्रतिमा उसी संघर्ष, साधना और आत्मबल की कहानी को मूर्त रूप देती है।

सनातन संस्कृति से जुड़ाव और वैश्विक संदेश

दिल्ली का अक्षरधाम पहले से ही दुनिया के सबसे ज्यादा देखे जाने वाले सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्थलों में शामिल है। अब नीलकंठ वर्णी की इस विशाल प्रतिमा के जुड़ने से यहां आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए एक नया आकर्षण जुड़ जाएगा। मंदिर से जुड़े लोगों का कहना है कि यह प्रतिमा केवल एक मूर्ति नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है। ऐसी ही भव्य प्रतिमाएं गुजरात के गांधीनगर और अमेरिका के न्यू जर्सी स्थित स्वामीनारायण मंदिरों में भी स्थापित हैं, जो पूरी दुनिया में भारतीय संस्कृति का संदेश देती हैं। नीलकंठ वर्णी का जीवन त्याग, अनुशासन और मानवता की सेवा का उदाहरण माना जाता है। अक्षरधाम में यह प्रतिमा लोगों को यही याद दिलाएगी कि सच्ची शक्ति बाहरी वैभव में नहीं, बल्कि आत्मसंयम और साधना में निहित होती है।

 

Read More-दिल्ली से जालंधर तक टकराव! कपिल मिश्रा की FIR पर विधानसभा भड़की, स्पीकर ने पुलिस कमिश्नर पर साधा निशाना

Related articles

Leave a reply

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest posts