गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन इलाके से सामने आई एक मां की कहानी इन दिनों लोगों को भावुक कर रही है। यहां रहने वाली निर्मला देवी पिछले 13 वर्षों से अपने बेटे हरीश राणा की सेवा कर रही हैं। 32 वर्षीय हरीश लंबे समय से गंभीर हालत में बिस्तर पर पड़े हैं और खुद से कोई काम करने की स्थिति में नहीं हैं। इस दौरान उनकी मां ने अपने जीवन का लगभग हर पल बेटे की देखभाल में बिताया है। राज एम्पायर सोसायटी की 13वीं मंजिल पर बने फ्लैट में रहने वाली निर्मला देवी की दुनिया अब सिर्फ उनके बेटे तक सीमित होकर रह गई है। सुबह से लेकर रात तक उनका पूरा समय बेटे की जरूरतों को पूरा करने में बीतता है। लेकिन अब अदालत के एक फैसले ने उनकी जिंदगी को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां भावनाएं और हकीकत आमने-सामने दिखाई देती हैं।
बेटे की सेवा ही बन गई मां की दुनिया
निर्मला देवी बताती हैं कि पिछले 13 सालों में उनका हर दिन लगभग एक जैसा ही रहा है। सुबह होते ही सबसे पहले वह अपने बेटे की हालत देखती हैं, उसे दवा देती हैं और उसके शरीर की सफाई करती हैं। दिन में कई बार मालिश करना, डॉक्टरों की सलाह के अनुसार दवाएं देना और उसके स्वास्थ्य पर लगातार नजर रखना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। रात के समय भी उन्हें चैन की नींद नहीं मिलती। जब पूरा शहर सो जाता है, तब भी वह कई बार उठकर बेटे की सांसों को देखती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि सब ठीक है। कई बार वह बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए उससे बातें भी करती हैं। भले ही बेटा कोई प्रतिक्रिया नहीं देता, लेकिन मां के मन में यह उम्मीद हमेशा बनी रहती है कि एक दिन वह आंखें खोलेगा और उन्हें “मां” कहकर पुकारेगा।
इच्छामृत्यु के फैसले के बाद बढ़ा दर्द
हाल ही में अदालत ने हरीश राणा के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है। यह फैसला कानूनी प्रक्रिया के तहत लिया गया है, लेकिन मां के लिए इसे स्वीकार करना बेहद मुश्किल हो गया है। निर्मला देवी कहती हैं कि उन्होंने कभी यह नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब उन्हें अपने बेटे से हमेशा के लिए बिछड़ने का डर सताएगा। वह खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश जरूर करती हैं, लेकिन अंदर से बेहद टूट चुकी हैं। उनकी आंखों में लगातार आंसू दिखाई देते हैं। खाना-पीना भी कम हो गया है और दिनभर उनका मन भारी रहता है। उनके अनुसार पिछले कई सालों से उन्होंने अपने बेटे के साथ हर मुश्किल का सामना किया है, इसलिए अब यह फैसला उन्हें भीतर तक झकझोर रहा है।
दरवाजे की घंटी बजते ही घबरा जाती हैं मां
निर्मला देवी बताती हैं कि अब उनके मन में एक अलग तरह का डर घर कर गया है। घर की दरवाजे की घंटी बजते ही उनका दिल तेज धड़कने लगता है। उन्हें लगता है कि शायद डॉक्टरों की टीम आ गई है और अब उनके बेटे को अस्पताल ले जाया जाएगा। इस ख्याल से ही उनका मन घबरा उठता है। वह कहती हैं कि एक मां के लिए अपने बच्चे को इस तरह खोने का डर बहुत भारी होता है। 13 साल तक बेटे की सांसों की रखवाली करने के बाद अब यह फैसला उनके लिए जिंदगी की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है। यह कहानी सिर्फ एक कानूनी फैसले की नहीं है, बल्कि उस मां की भावनाओं की भी है जिसने अपने बेटे के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
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