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दिल्ली अग्निकांड: “मां, मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊंगी…” धुएं के गुबार में गुम हो गई बेटी की आखिरी चीख, बाथरूम के दरवाजे पर मिलीं दो लिपटी हुई लाशें!

दिल्ली के पालम (साधनगर) अग्निकांड में मां-बेटी की मौत की ऐसी दास्तां सामने आई है जो पत्थर दिल इंसान को भी रुला दे। बुजुर्ग मां को बचाने के चक्कर में बेटी हिमांशी ने अपनी जान दे दी।

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देश की राजधानी दिल्ली का पालम इलाका मंगलवार की सुबह एक ऐसी त्रासदी का गवाह बना, जिसकी कल्पना मात्र से रूह कांप उठती है। साधनगर की एक बहुमंजिला इमारत में जब आग लगी, तो वहां चीख-पुकार मच गई। इस भीषण अग्निकांड में कश्यप परिवार के 9 लोगों की हंसती-खेलती जिंदगी राख में तब्दील हो गई। लेकिन इस तबाही के मलबे से एक ऐसी कहानी निकलकर आई है, जो मां और बेटी के अटूट प्रेम की मिसाल है। 70 साल की बुजुर्ग लाडो कश्यप और उनकी बेटी हिमांशी दूसरी मंजिल पर फंसी हुई थीं। चश्मदीदों और करीबियों के अनुसार, जब आग की लपटें तेजी से ऊपर की ओर बढ़ रही थीं, तब हिमांशी के पास भागकर अपनी जान बचाने का मौका था। लेकिन अपनी बुजुर्ग मां को बेबस छोड़कर जाना उसे मंजूर नहीं था। धुएं के काले गुबार के बीच बेटी की ममता ने मौत को गले लगाना बेहतर समझा, पर साथ नहीं छोड़ा।

प्लास्टिक ने आग में डाला घी का काम

जैसे-जैसे आग की तपिश बढ़ती गई, घर के भीतर ऑक्सीजन खत्म होने लगी। लाडो कश्यप उम्र के तकाजे के कारण तेज भागने में असमर्थ थीं। हिमांशी ने उन्हें सहारा दिया और सुरक्षित स्थान की तलाश में दोनों बाथरूम की ओर भागीं। उन्हें लगा होगा कि पानी और बंद दरवाजा उन्हें बचा लेगा, लेकिन बदकिस्मती से वहां रखे कॉस्मेटिक्स के सामान और प्लास्टिक के डिब्बों ने आग को और भड़का दिया। बंद बाथरूम देखते ही देखते एक ‘गैस चैंबर’ में तब्दील हो गया। जहरीले धुएं और भयंकर लपटों ने मां-बेटी को संभलने का मौका तक नहीं दिया। जब दमकल कर्मियों ने घंटों की मशक्कत के बाद दरवाजा तोड़ा, तो वहां का मंजर देखकर उनकी आंखों में भी आंसू आ गए। मां और बेटी की जली हुई लाशें एक-दूसरे से लिपटी हुई मिलीं, मानो आखिरी वक्त में भी बेटी अपनी मां को ढांढस बंधा रही हो।

रिश्तेदारों का छलका दर्द: “बिल्डिंग के नीचे खड़े रहे, पर अपनों को जलते देखते रहे”

इस हादसे की खबर जैसे ही लाडो की बहन बाला को मिली, वह बदहवास होकर साधनगर पहुँचीं। बिल्डिंग के नीचे खड़ी बाला और अन्य रिश्तेदारों को उस समय अंदाजा भी नहीं था कि अंदर उनके अपने किस हाल में हैं। पड़ोसियों ने बताया कि लाडो कश्यप एक सीधी-सादी महिला थीं जो ज्यादातर घर के भीतर ही रहती थीं। हिमांशी अपनी मां की परछाई बनकर रहती थी। उस दिन भी हिमांशी ने अपनी जान की परवाह किए बिना मां को बचाने की जो कोशिश की, वह आज पूरे इलाके में चर्चा का विषय है। रिश्तेदारों का कहना है कि अगर फायर ब्रिगेड का हाइड्रोलिक लैटर सिस्टम समय पर काम कर जाता या गलियां इतनी संकरी न होतीं, तो शायद आज ये 9 जिंदगियां हमारे बीच होतीं। सिस्टम की खामियों और संकरी गलियों ने कश्यप परिवार के चिराग बुझा दिए।

9 मौतों के बाद उठे कई सुलगते सवाल

पालम के इस साधनगर अग्निकांड ने एक बार फिर दिल्ली की अवैध इमारतों और सुरक्षा मानकों की पोल खोल दी है। इस हादसे में सिर्फ एक परिवार नहीं उजड़ा, बल्कि प्रशासन की लापरवाही भी उजागर हुई है। दमकल विभाग के संसाधनों की कमी और घनी आबादी वाले इलाकों में बचाव कार्यों की चुनौतियों ने 9 लोगों की बलि ले ली। हिमांशी और लाडो कश्यप की मौत केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि उस सिस्टम की नाकामी है जो नागरिकों को सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पाता। आज पालम की उन गलियों में सन्नाटा पसरा है, लेकिन लोगों के जहन में हिमांशी का वो बलिदान हमेशा रहेगा, जिसने अपनी मां के लिए हंसते-हंसते मौत को गले लगा लिया। सवाल अब भी वही है—क्या हम अगले किसी ‘पालम’ के होने का इंतजार करेंगे या इन संकरी गलियों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम होंगे?

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