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जज हटाने की मांग पर गरमाई अदालत, केजरीवाल की दलीलों से मचा हंगामा!

दिल्ली शराब नीति केस में अरविंद केजरीवाल की अदालत में खुद दलीलें रखने पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कड़ी आपत्ति जताई।

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दिल्ली शराब नीति मामले में सोमवार को अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाईकोर्ट में खुद पेश होकर अपनी दलीलें रखीं, जिससे सुनवाई के दौरान माहौल अचानक गंभीर और संवेदनशील हो गया। केजरीवाल ने न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा से आग्रह किया कि वे इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लें। उन्होंने कहा कि उन्होंने इसके लिए औपचारिक रिक्यूजल याचिका दाखिल की है और इसे रिकॉर्ड में लिया जाए। अदालत ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए रिकॉर्ड में शामिल कर लिया और मामले में आगे की सुनवाई के लिए 13 अप्रैल की तारीख तय कर दी। इस दौरान अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो से भी जवाब मांगा, जिससे मामला और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।

‘अदालत नौटंकी का मंच नहीं’—सॉलिसिटर जनरल का तीखा जवाब

केजरीवाल की इस पहल का कड़ा विरोध करते हुए तुषार मेहता ने अदालत में सख्त शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि केजरीवाल द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह बेबुनियाद और न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि अदालत कोई “नौटंकी का मंच” नहीं है जहां इस तरह के आरोप लगाए जाएं। मेहता ने यह भी कहा कि यदि केजरीवाल खुद अदालत में पेश होकर बहस करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने वकील को हटा देना चाहिए, क्योंकि दोनों एक साथ बहस नहीं कर सकते। इस टिप्पणी के बाद कोर्ट रूम में माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया, और यह बहस पूरे मामले का केंद्र बन गई।

अन्य आरोपियों ने भी उठाई जज बदलने की मांग

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि इस मामले में बरी किए गए सात अन्य आरोपियों ने भी न्यायमूर्ति को हटाने की मांग की है। इस पर जस्टिस शर्मा ने कहा कि यदि कोई और आरोपी भी ऐसी याचिका देना चाहता है, तो वह दे सकता है ताकि सभी आवेदनों पर एक साथ फैसला लिया जा सके। इस बयान से यह साफ हो गया कि मामला अब केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कई आरोपियों की तरफ से न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इससे आने वाले दिनों में इस केस की दिशा और भी जटिल हो सकती है।

क्या है पूरा मामला और आगे क्या होगा

 

यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब 27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अन्य 21 आरोपियों को इस मामले में बरी कर दिया था। अदालत ने अपने फैसले में सीबीआई की जांच पर सवाल उठाते हुए कहा था कि मामला ठोस सबूतों के अभाव में टिक नहीं पाया। इसके बाद सीबीआई ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। 9 मार्च को हाईकोर्ट ने सभी 23 आरोपियों को नोटिस जारी किया था। अब इस नए घटनाक्रम के बाद, जहां जज को हटाने की मांग और अदालत में तीखी बहस हुई है, यह मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है। 13 अप्रैल की सुनवाई में यह तय होगा कि न्यायमूर्ति इस केस की सुनवाई जारी रखेंगी या नहीं, और इसी के साथ इस हाई-प्रोफाइल केस की अगली दिशा भी स्पष्ट होगी।

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