दिल्ली हाई कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और झकझोर देने वाले मामले में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि किसी छोटे बच्चे को कामुक इरादे से अपने गुप्तांगों को छूने के लिए मजबूर करना गंभीर यौन हमला है और यह अपराध बाल यौन अपराध संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत पूरी तरह दंडनीय है। अदालत ने इस मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की अपील को खारिज कर दिया, जिसने सजा को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ कानून की सख्ती को दर्शाता है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि बच्चों के खिलाफ किसी भी प्रकार की यौन हरकत को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अदालत ने कहा कि बच्चों की मासूमियत का शोषण करना सबसे घिनौना अपराध है और इसमें किसी भी तरह की नरमी की कोई गुंजाइश नहीं हो सकती।
क्या था पूरा मामला, कैसे हुआ अपराध
यह मामला एक चार साल की मासूम बच्ची से जुड़ा है, जिसके साथ आरोपी ने उसके ही घर में घिनौनी हरकत की। आरोपी बच्ची के घर में किरायेदार के रूप में रहता था और इसी भरोसे का उसने फायदा उठाया। वर्ष 2022 में आरोपी ने बच्ची के सामने अपने गुप्तांगों को प्रदर्शित किया और फिर उसे छूने के लिए मजबूर किया। बच्ची इतनी छोटी थी कि वह उस समय पूरी तरह यह भी नहीं समझ पा रही थी कि उसके साथ क्या गलत हो रहा है। बाद में जब परिजनों को इस घटना की जानकारी हुई, तो उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। निचली अदालत ने मामले की सुनवाई के बाद जुलाई 2024 में आरोपी को दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इसी सजा को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
हाई कोर्ट ने आरोपी की दलीलें क्यों खारिज कीं
अपील की सुनवाई के दौरान आरोपी ने दावा किया कि बच्ची को सिखाया-पढ़ाया गया है और उसके खिलाफ कोई ठोस सबूत मौजूद नहीं हैं। उसने यह भी तर्क दिया कि प्राथमिकी दर्ज करने में देरी हुई है, जिससे मामले की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। हालांकि, दिल्ली हाई कोर्ट ने इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने कहा कि पीड़िता के बयान शुरू से अंत तक एक जैसे रहे हैं और अभिव्यक्ति में मामूली अंतर उसकी सच्चाई को कमजोर नहीं करता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि नाबालिग के मामलों में शिकायत दर्ज करने में हुई देरी को सामान्य रूप से देखा जाना चाहिए, क्योंकि परिवार पहले मानसिक रूप से स्थिति को समझने और संभालने की कोशिश करता है। बच्ची की मां द्वारा पति के दूसरे शहर से लौटने का इंतजार करना अदालत ने स्वाभाविक माना।
फैसले का कानूनी और सामाजिक महत्व
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में दो टूक कहा कि बारह साल से कम उम्र के बच्चे के साथ यौन प्रकृति की कोई भी हरकत गंभीर यौन अपराध की श्रेणी में आती है और ऐसे मामलों में POCSO Act की धारा 10 पूरी तरह लागू होती है। अदालत ने कहा कि इस तरह के अपराधों में बच्चों की उम्र, उनकी मानसिक स्थिति और अपराध की प्रकृति को देखते हुए सख्त सजा देना जरूरी है। यह फैसला उन सभी लोगों के लिए चेतावनी है, जो बच्चों की मासूमियत का फायदा उठाने की सोचते हैं। साथ ही, यह निर्णय अभिभावकों और समाज को भी जागरूक करता है कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही भारी पड़ सकती है। कोर्ट का यह फैसला आने वाले समय में ऐसे मामलों में एक मजबूत मिसाल के रूप में देखा जाएगा।
