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खामेनेई की याद में ईद पर काली पट्टी बांधे दिखे नमाजी, ईरान को लेकर भावुक हुआ मुस्लिम समुदाय?

पूरे देश के शिया समुदाय ने इस बार की ईद को 'यौम-ए-सोग' (शोक के दिन) के रूप में मनाया।

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शनिवार, 21 मार्च 2026 को जहाँ पूरा देश ईद-उल-फितर के जश्न में डूबा था, वहीं हिंदुस्तान के कई हिस्सों से ऐसी तस्वीरें सामने आईं जिन्होंने सबको झकझोर कर रख दिया। दिल्ली के ऐतिहासिक इमामिया हॉल मस्जिद में ईद की नमाज के दौरान एक अलग ही मंजर देखने को मिला। यहाँ नमाज अदा करने आए हजारों नमाजियों के हाथों पर ‘काली पट्टी’ बंधी हुई थी। इस भीड़ में पूर्व केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी और लद्दाख के सांसद मोहम्मद हनीफा जान भी शामिल थे। ईद के इस पाक मौके पर न तो चेहरों पर वो पुरानी चमक थी और न ही गले मिलने में वो उल्लास। पूरे देश के शिया समुदाय ने इस बार की ईद को ‘यौम-ए-सोग’ (शोक के दिन) के रूप में मनाया। यह विरोध और गम का इजहार उस महाशक्ति के खिलाफ था जिसने समूचे विश्व की शांति को खतरे में डाल दिया है।

इमामिया हॉल में सिसकियाँ और विरोध

दिल्ली के इमामिया हॉल में जब ईद की नमाज शुरू हुई, तो माहौल पूरी तरह गमगीन था। सांसद मोहम्मद हनीफा जान और मुख्तार अब्बास नकवी की मौजूदगी में नमाजियों ने न केवल खुदा की इबादत की, बल्कि ईरान पर हुए अमेरिका और इजरायल के हमलों के खिलाफ अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। दरअसल, मुस्लिम समुदाय, विशेषकर शिया समाज, आयतुल्लाह खामेनेई की शहादत और उस हमले में मारी गई 165 मासूम बच्चियों की मौत से गहरे सदमे में है। नमाज के बाद अनवर मिर्जा ने भावुक होते हुए कहा, “जिस घर का बाप चला जाए, वहां बच्चे खुशियां कैसे मना सकते हैं? हमारे रूहानी रहबर (आध्यात्मिक नेता) हमसे छीन लिए गए हैं, ऐसे में ईद की नमाज तो फर्ज है इसलिए पढ़ ली, लेकिन दिल में खुशियां रत्ती भर भी नहीं हैं।”

अमेरिका-इजरायल के खिलाफ आक्रोश

विरोध की यह आग सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं रही। लखनऊ, मुंबई, कानपुर, अमरोहा, बरेली से लेकर कश्मीर और लद्दाख तक, भारत के हर बड़े शहर में नमाजी काली पट्टी बांधकर सड़कों पर उतरे। शाहजहाँपुर, लखीमपुर खीरी, देहरादून और हैदराबाद जैसे शहरों में भी ईद की नमाज के बाद अमेरिका और इजरायल के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ईरान पर हुआ हमला केवल एक देश पर हमला नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत और इस्लाम के रूहानी केंद्रों पर हमला है। कई जगहों पर नमाजियों ने काले कपड़े पहनकर अपना विरोध जताया। लोगों का कहना था कि वे दुनिया को यह संदेश देना चाहते हैं कि जुल्म के खिलाफ खामोश रहना भी एक गुनाह है, और भारतीय मुसलमान मजलूमों के साथ खड़ा है।

पेश इमाम का छलका दर्द और रूहानी संदेश

आदर्श नगर स्थित हुसैनिया हॉल के पेश इमाम मौलाना मज़हर हसन नकवी ने इस मौके पर बहुत ही मार्मिक बात कही। उन्होंने कहा कि ईद अल्लाह का इनाम है, लेकिन जब कौम का रहबर शहीद हो जाए, तो खुशियां मनाना नामुमकिन हो जाता है। मौलाना ने साफ किया कि ईद की नमाज पढ़ना जरूरी है क्योंकि यह मजहबी रवायत है, लेकिन जिस तरह से हर साल गले मिलकर और खुशियां बांटकर ईद मनाई जाती थी, इस बार वैसा कुछ नहीं है। उन्होंने कहा, “हम लोग आज विरोध भी कर रहे हैं और दुआएं भी, क्योंकि हम अमन चाहते हैं।” हालांकि, कुछ धर्मगुरुओं का मानना था कि ईद के दिन विरोध प्रदर्शन से बचना चाहिए, लेकिन अधिकांश संगठनों ने इसे ‘जुल्म के खिलाफ शांतिपूर्ण आवाज’ करार देते हुए जायज ठहराया।

काली पट्टी की पुरानी परंपरा और वैश्विक संदेश: अमन की पुकार

मुस्लिम समुदाय में शोक या विरोध जताने के लिए काली पट्टी बांधना एक बहुत पुरानी रिवायत रही है। इस बार यह परंपरा ईरान के प्रति संवेदना दिखाने का सबसे बड़ा जरिया बनी। भारत के शिया समुदाय के लिए आयतुल्लाह खामेनेई केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि एक रूहानी मार्गदर्शक थे। उनकी मौत ने भारतीय मुसलमानों को भावनात्मक रूप से तोड़ कर रख दिया है। जानकारों का मानना है कि भारत में हुआ यह व्यापक विरोध प्रदर्शन वैश्विक स्तर पर एक बड़ा संदेश दे रहा है। लोग चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस नाइंसाफी को देखे और पश्चिम एशिया में जारी खूनी खेल को तुरंत रोका जाए। नमाज के बाद हुई विशेष दुआओं में फिलिस्तीन और ईरान के शहीदों को याद किया गया और दुनिया में अमन-चैन की बहाली की कामना की गई।

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