देशभर में 26 जनवरी 2026 को 77वां गणतंत्र दिवस पूरे उत्साह और सम्मान के साथ मनाया जा रहा था। इसी क्रम में महाराष्ट्र के नाशिक जिले में भी गणतंत्र दिवस का सरकारी कार्यक्रम आयोजित किया गया था। यहां झंडा फहराने के बाद राज्य के मंत्री गिरीश महाजन लोगों को संबोधित कर रहे थे। भाषण सामान्य रूप से चल रहा था, लेकिन अचानक कार्यक्रम स्थल पर उस वक्त हलचल मच गई जब एक महिला पुलिसकर्मी ने बीच भाषण में मंत्री से सवाल कर दिया। इस अचानक घटनाक्रम से कुछ देर के लिए समारोह का माहौल तनावपूर्ण हो गया और वहां मौजूद लोग हैरान रह गए।
महिला पुलिसकर्मी ने क्यों उठाया सवाल
मंत्री से सवाल पूछने वाली महिला पुलिसकर्मी का नाम माधवी जाधव बताया गया है, जो फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में तैनात हैं। उन्होंने मंत्री गिरीश महाजन पर अपने भाषण में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का नाम न लेने का आरोप लगाया। माधवी जाधव ने कहा कि वह पूरे भाषण के दौरान बाबासाहेब का नाम आने का इंतजार करती रहीं, लेकिन उनका नाम कहीं नहीं लिया गया। उनका कहना था कि जिन्होंने देश को संविधान दिया और लोकतंत्र की नींव रखी, उनका नाम गणतंत्र दिवस जैसे मौके पर न लेना बहुत बड़ी भूल है। सवाल उठाते ही मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें वहां से अलग कर दिया।
‘सस्पेंड कर सकते हैं, लेकिन माफी नहीं मांगूंगी’
घटना के बाद माधवी जाधव ने मीडिया से बातचीत में अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की। उन्होंने कहा कि उन्हें सस्पेंड किया जा सकता है, लेकिन वह अपने बयान के लिए माफी नहीं मांगेंगी। उनके अनुसार बाबासाहेब आंबेडकर की पहचान और योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने संविधान बनाया, उनका नाम न लेना गलत है। माधवी जाधव ने यह भी कहा कि वे किसी तरह की डील नहीं करना चाहतीं और उन्हें जो भी काम सौंपा जाएगा, वह उसे करने को तैयार हैं, लेकिन बाबासाहेब के सम्मान से कोई समझौता नहीं करेंगी।
संविधान और गणतंत्र दिवस को लेकर उठे बड़े सवाल
महिला पुलिसकर्मी ने यह भी सवाल उठाया कि जब भाषण में कई अन्य लोगों के नाम लिए गए, तो संविधान और गणतंत्र दिवस के मूल आधार से जुड़े व्यक्ति का नाम क्यों नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस और लोकतंत्र की बात करने वाले कार्यक्रम में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का नाम आना जरूरी था। इस घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी बहस शुरू हो गई है। कुछ लोग महिला पुलिसकर्मी के साहस की सराहना कर रहे हैं, तो कुछ लोग सरकारी कार्यक्रम में इस तरह के विरोध को अनुशासन के खिलाफ बता रहे हैं। यह मामला अब केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संविधान, सम्मान और अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़ी चर्चा का विषय बन गया है।
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