पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच एक ऐसी घटना सामने आई जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। मालदा जिले के कालियाचक-II ब्लॉक स्थित बीडीओ कार्यालय के बाहर शुरू हुआ एक विरोध प्रदर्शन अचानक हिंसक मोड़ ले बैठा। यह विरोध वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने को लेकर था, जिससे नाराज़ लोगों ने पहले अधिकारियों से बातचीत की मांग की। जब उनकी मांग पूरी नहीं हुई, तो गुस्साई भीड़ ने दफ्तर का घेराव कर लिया। देखते ही देखते हालात इतने बिगड़ गए कि तीन महिलाओं समेत कुल सात न्यायिक अधिकारियों को अंदर ही बंधक बना लिया गया। हैरानी की बात यह रही कि इन अधिकारियों के साथ एक पांच साल का बच्चा भी मौजूद था, जिसे घंटों तक बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल सकीं।
SIR प्रक्रिया बनी विवाद की जड़
दरअसल, यह पूरा मामला स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसके तहत मतदाता सूची की जांच की जा रही थी। इस प्रक्रिया में करीब 63 लाख नाम हटाए गए, जबकि लगभग 60 लाख लोगों के नामों की जांच जारी थी। यही वजह थी कि बड़ी संख्या में लोग असंतोष में थे। जिन अधिकारियों को बंधक बनाया गया, वे इन्हीं मामलों की समीक्षा करने पहुंचे थे। आरोप है कि प्रदर्शनकारियों को यह डर था कि उनके नाम भी वोटर लिस्ट से हट सकते हैं। इसी आशंका ने इस विरोध को उग्र बना दिया। इस दौरान न केवल अधिकारियों को रोका गया, बल्कि बाहर सड़कों पर भी हंगामा हुआ—NH-12 को जाम किया गया, टायर जलाए गए और सड़क पर खाना बनाते लोगों के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गए।
9 घंटे बाद रेस्क्यू, पुलिस पर भी हमला
करीब 9 घंटे तक चले इस तनावपूर्ण हालात के बाद देर रात पुलिस टीम ने ऑपरेशन चलाकर सभी अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला। हालांकि, यह काम आसान नहीं था। जब पुलिस अधिकारियों को लेकर निकल रही थी, तब भीड़ ने उन पर पथराव किया और गाड़ियों का पीछा किया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि पूरे इलाके में अफरातफरी का माहौल बन गया। इस मामले में अब तक 18 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। वहीं, विपक्षी दलों ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि प्रशासन की लापरवाही के कारण ही स्थिति इतनी बिगड़ी और अधिकारियों की जान जोखिम में पड़ी।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और बड़े सवाल
जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने इसे बेहद गंभीर माना और कड़ी नाराज़गी जताई। कोर्ट ने इसे “आपराधिक विफलता” बताते हुए राज्य प्रशासन को जमकर फटकार लगाई। सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि रात 11 बजे तक जिला प्रशासन का कोई बड़ा अधिकारी मौके पर मौजूद नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि यह घटना केवल अधिकारियों को डराने की कोशिश नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को चुनौती देने जैसा है। कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि मामले की जांच केंद्रीय एजेंसियों से कराई जाए और अधिकारियों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बल तैनात किए जाएं। साथ ही, अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण इतना ज्यादा है कि हर घटना में राजनीति नजर आती है। अब इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की कानून-व्यवस्था और चुनावी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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