छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले के रेंगाखार गांव के समलू मरकाम की कहानी उन हजारों गरीब परिवारों का दर्द बयां करती है, जो बीमारी से नहीं बल्कि इलाज के खर्च से टूट जाते हैं। पिछले तीन साल से उनकी पत्नी कपुरा मरकाम थायरॉयड कैंसर से लड़ रही हैं। हालत इतनी बिगड़ चुकी है कि खड़े होना तो दूर, पैरों में संवेदना तक नहीं बची है। फिर भी समलू हर दिन उम्मीद लेकर उठते हैं, शायद आज कहीं से कोई मदद मिल जाए। पैसों की कमी के चलते उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल को ही ऐम्बुलेंस बना लिया है। पीछे लकड़ी की पटरी लगाकर और गद्दा बिछाकर वे पत्नी को लिटाते हैं और रस्सी से बांध कर अस्पताल तक पहुंचाते हैं, ताकि सफर में कोई हादसा न हो।
इलाज के लिए बिक गया घर-खेत
पत्रिका की तरह दर्द बयां करते हुए समलू बताते हैं कि तीन साल पहले जब कैंसर का पता चला, तब से लेकर आज तक उन्होंने हर संभव प्रयास किया। छत्तीसगढ़ से लेकर दूसरे राज्यों तक, सरकारी-असरकारी सभी अस्पतालों का चक्कर लगाया। आयुर्वेदिक और देसी इलाज भी आजमाए, लेकिन हालत में कोई सुधार नहीं आया। इस दौरान लगभग पांच लाख रुपये इलाज में खर्च हो गए और समलू को अपनी जमीन-जायदाद तक बेचनी पड़ी। अब घर और खेत दोनों नहीं रहे। बस बची है उनकी हिम्मत और पत्नी को बचाने की चाह। वह कहते हैं—“अब मेरे पास कुछ भी नहीं बचा। बस इतना चाहता हूं कि पत्नी ठीक हो जाए, वरना भगवान चाहे तो मुझे उठा ले।”
एम्स रायपुर में जारी संघर्ष
इस समय कपुरा मरकाम रायपुर एम्स में भर्ती हैं, लेकिन नियमित जांचों की फीस तक देने के लिए पैसे नहीं हैं। समलू रायपुर सदन में रहकर राहगीरों और समाजसेवी लोगों से मदद मांगते हैं, ताकि पत्नी का इलाज जारी रह सके। उन्होंने कई बार जिला प्रशासन, मुख्यमंत्री और अन्य अधिकारियों से आर्थिक सहायता की गुहार लगाई, पर अब तक कोई ठोस मदद नहीं मिल सकी। थक चुके समलू की आंखों में दर्द और उम्मीद दोनों नजर आती हैं। वह कहते हैं कि गरीबी सबसे बड़ा अभिशाप है, लेकिन पत्नी को बचाने की जिद उन्हें अभी भी लड़ने की हिम्मत देती है।
सरकारी योजनाओं की संभावनाएँ
कवर्धा के जिला चिकित्सा और स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर देवेंद्र कुमार तुर्रे बताते हैं कि इस तरह के गंभीर मरीजों के लिए आयुष्मान कार्ड में पांच लाख रुपये तक के मुफ्त इलाज की सुविधा है। उन्होंने सलाह दी कि कपुरा मरकाम का इलाज बालको कैंसर केयर अस्पताल में बेहतर तरीके से हो सकता है, जहां कई मरीजों को फायदा मिला है। डॉक्टर तुर्रे के अनुसार, एक बार ऑपरेशन होने के बाद मरीज हर महीने जिला अस्पताल में मुफ्त कीमोथैरेपी करा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि मरीज आर्थिक रूप से कमजोर है तो शासन से आर्थिक सहायता भी मिल सकती है, बशर्ते सही प्रक्रियाओं के तहत आवेदन किया जाए। अब बाकी उम्मीद इस बात पर टिकी है कि समलू तक यह मदद कब पहुंचेगी और समय रहते उनकी पत्नी को उपचार मिल पाएगा या नहीं।
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