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LPG सिलेंडर पर हाईकोर्ट का चौकानें वाला फैसला, कलेक्टर की ताकत पर लगाया ब्रेक! क्या दिया आदेश?

केरल हाईकोर्ट ने LPG सिलेंडर कमी मामले में बड़ा फैसला दिया। कलेक्टर द्वारा लगाया गया जुर्माना और 2.13 लाख की वसूली रद्द, कहा- आर्थिक दंड लगाने का अधिकार नहीं। जानें पूरा मामला।

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LPG सिलेंडर की कमी को लेकर आए एक अहम फैसले में Kerala High Court ने जिला प्रशासन की शक्तियों को लेकर बड़ा स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने साफ कहा कि किसी भी एलपीजी डीलर पर जुर्माना लगाने या आर्थिक वसूली करने का अधिकार जिला कलेक्टर के पास नहीं है। यह फैसला न केवल एक मामले तक सीमित है, बल्कि पूरे देश में प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत जो शक्तियां निर्धारित हैं, उन्हीं के दायरे में रहकर कार्रवाई की जा सकती है, उससे बाहर नहीं।

निरीक्षण के बाद लगाया गया था जुर्माना

यह मामला केरल के अलाप्पुझा जिले का है, जहां साल 2014 में एक LPG एजेंसी पर औचक निरीक्षण किया गया था। जांच के दौरान अधिकारियों ने स्टॉक रजिस्टर में गड़बड़ी और घरेलू व कमर्शियल सिलेंडरों की कमी का आरोप लगाया। इसके बाद जिला कलेक्टर ने LPG एजेंसी पर 500 रुपये का जुर्माना लगाया और करीब 2.13 लाख रुपये की वसूली का आदेश दिया। हालांकि, एजेंसी मालिक ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि न तो कोई सिलेंडर गायब था और न ही रिकॉर्ड में कोई कमी थी। इसी के बाद मामला अदालत तक पहुंचा।

जुर्माना और वसूली का आदेश पूरी तरह रद्द

मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कलेक्टर के फैसले को अवैध करार देते हुए पूरी तरह रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत प्रशासनिक अधिकारी केवल तलाशी और जब्ती कर सकते हैं, लेकिन किसी पर आर्थिक दंड नहीं लगा सकते। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जुर्माना लगाने का अधिकार केवल सक्षम न्यायालय के पास होता है। इस मामले में कलेक्टर द्वारा लगाए गए दोनों दंड—500 रुपये का जुर्माना और 2.13 लाख रुपये की वसूली—को गैरकानूनी बताया गया।

देशभर में प्रशासनिक कार्रवाई पर पड़ेगा प्रभाव

अदालत ने अपने फैसले में LPG वितरण से जुड़े नियमों का भी जिक्र किया और कहा कि इन प्रावधानों में भी कलेक्टर को आर्थिक दंड लगाने की शक्ति नहीं दी गई है। राज्य सरकार की ओर से यह दलील दी गई थी कि पूरी प्रक्रिया का पालन किया गया था, लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि केवल प्रक्रिया का पालन करना पर्याप्त नहीं है, अगर कार्रवाई करने का अधिकार ही नहीं है। इस फैसले का असर आने वाले समय में कई मामलों पर पड़ सकता है और यह प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि वे अपनी सीमाओं के भीतर रहकर ही कार्रवाई करें।

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