देश की शीर्ष अदालत Supreme Court of India ने मशहूर पेय ‘Rooh Afza’ को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाते हुए Hamdard Laboratories को राहत दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि रूह अफ़ज़ा को फ्रूट ड्रिंक/प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट की श्रेणी में रखा जाएगा और इस पर 12.5 प्रतिशत की जगह केवल 4 प्रतिशत वैट लगाया जाएगा। यह निर्णय उत्तर प्रदेश वैट अधिनियम 2008 के तहत कर निर्धारण से जुड़े लंबे विवाद का अंत करता है। अदालत की इस टिप्पणी के बाद न सिर्फ हमदर्द को बड़ी वित्तीय राहत मिली है, बल्कि राज्य में अन्य समान उत्पादों की टैक्स श्रेणी को लेकर भी स्पष्टता आ गई है। इस फैसले से व्यापार जगत में सकारात्मक संदेश गया है कि उत्पाद की वास्तविक प्रकृति के आधार पर ही कर तय होना चाहिए, न कि केवल नाम या पारंपरिक पहचान के आधार पर।
क्या था पूरा विवाद?
यह मामला आकलन वर्ष 2007-08 और 2008-09 से जुड़ा हुआ था। हमदर्द ने रूह अफ़ज़ा की बिक्री पर 4 प्रतिशत की दर से वैट जमा किया था, यह दावा करते हुए कि यह उत्पाद प्रोसेस्ड या प्रिजर्व्ड फ्रूट, फ्रूट स्क्वैश, फ्रूट ड्रिंक और फ्रूट जूस की श्रेणी में आता है। लेकिन कर विभाग ने इस पर आपत्ति जताई और इसे नॉन-फ्रूट तथा कृत्रिम तत्वों से तैयार पेय मानते हुए 12.5 प्रतिशत वैट लगाने का निर्णय लिया। प्रथम अपीलीय प्राधिकरण और वाणिज्यिक कर अधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने भी विभाग के पक्ष को सही ठहराया। ट्रिब्यूनल का कहना था कि आम बोलचाल में रूह अफ़ज़ा को शरबत के रूप में जाना जाता है, न कि फ्रूट ड्रिंक के रूप में। जुलाई 2018 में Allahabad High Court ने भी ट्रिब्यूनल के फैसले को बरकरार रखा और हमदर्द की याचिका खारिज कर दी। इसके बाद कंपनी ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फैसला?
सुप्रीम कोर्ट की पीठ में जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन शामिल थे। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कई राज्यों में रूह अफ़ज़ा को पहले से ही रियायती टैक्स दर पर रखा गया है, जिससे यह साबित होता है कि इसे फ्रूट ड्रिंक या प्रोसेस्ड फूड प्रोडक्ट के रूप में मान्यता दी जा सकती है। पीठ ने यह भी माना कि उत्पाद को फ्रूट ड्रिंक की श्रेणी में रखना न तो कृत्रिम व्याख्या है और न ही अव्यावहारिक, बल्कि यह व्यावसायिक रूप से स्वीकार्य और वास्तविक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इसे अधिनियम की अनुसूची-II की प्रविष्टि 103 के तहत रखा जा सकता है, जिससे 4 प्रतिशत की रियायती वैट दर लागू होगी। इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के निर्णय को रद्द करते हुए हमदर्द की अपील स्वीकार कर ली। यह निर्णय कर निर्धारण के मामलों में उत्पाद की वास्तविक प्रकृति को प्राथमिकता देने का महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
फैसले का असर और आगे की दिशा
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर केवल हमदर्द तक सीमित नहीं रहेगा। इससे उत्तर प्रदेश में अन्य खाद्य और पेय उत्पादों की टैक्स श्रेणी को लेकर भी नई बहस शुरू हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला व्यापारिक समुदाय के लिए राहत भरा है और भविष्य में कर विवादों के समाधान के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में काम करेगा। रूह अफ़ज़ा लंबे समय से भारतीय घरों में लोकप्रिय पेय रहा है, खासकर गर्मियों और रमजान के दौरान इसकी मांग बढ़ जाती है। अब कम टैक्स दर लागू होने से कंपनी को आर्थिक लाभ मिलेगा और संभावित रूप से उपभोक्ताओं को भी इसका फायदा मिल सकता है। कुल मिलाकर, यह फैसला कर व्यवस्था में स्पष्टता, निष्पक्षता और व्यावसायिक वास्तविकता को महत्व देने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
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