Thursday, February 5, 2026
Homeदेश“समानता के नाम पर नया विवाद?” UGC के नए नियम से क्यों...

“समानता के नाम पर नया विवाद?” UGC के नए नियम से क्यों घबराए जनरल कैटेगरी के छात्र, एक्सपर्ट्स ने बताई चौंकाने वाली वजह

UGC के नए समानता नियम 2026 को लेकर सामान्य वर्ग के छात्र क्यों डरे हुए हैं? क्या इक्विटी कमेटी और नए प्रावधानों से बढ़ेगा विवाद? जानिए एक्सपर्ट्स की राय, आंकड़ों की सच्चाई और इस कानून से जुड़ी तीन बड़ी चिंताएं।

-

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 15 जनवरी 2026 से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू कर दिए हैं। इन नियमों का घोषित उद्देश्य देश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव को खत्म करना और सभी छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना है। लेकिन नियम लागू होते ही यह मुद्दा देशभर में बहस का केंद्र बन गया। खासतौर पर सामान्य वर्ग के छात्र और कई शिक्षाविद् इन नियमों को लेकर असमंजस और डर की स्थिति में हैं। छात्रों का कहना है कि समानता के नाम पर बनाए गए ये प्रावधान कहीं उनके खिलाफ न इस्तेमाल किए जाएं। वहीं, UGC का तर्क है कि यह नियम एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए जरूरी हैं। इस टकराव के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या ये नियम वास्तव में समानता लाएंगे या कैंपस में नए विवादों की जमीन तैयार करेंगे।

 आंकड़े क्या कहते हैं और एक्सपर्ट की राय

शिक्षाविद् और अर्थशास्त्री डॉ. जयंतीलाल भंडारी के मुताबिक, देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में पिछले पांच वर्षों में 118.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। UGC द्वारा संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट में पेश आंकड़ों के अनुसार, साल 2019-20 में भेदभाव से जुड़े 173 मामले सामने आए थे, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गए। इसी अवधि में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों से कुल 1160 शिकायतें UGC को मिलीं। डॉ. भंडारी मानते हैं कि इन आंकड़ों से साफ है कि एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों के खिलाफ भेदभाव की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि शिकायतों में बढ़ोतरी की एक वजह छात्रों की बढ़ती जागरूकता भी हो सकती है। इसके बावजूद, कैंपस में समानता का लक्ष्य अभी काफी दूर नजर आता है। यही कारण है कि UGC ने नए नियम लाने की जरूरत महसूस की, लेकिन सवाल यह है कि क्या अपनाया गया तरीका सही है।

 सामान्य वर्ग की तीन बड़ी चिंताएं

UGC के नए समानता नियम को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों में डर की तीन प्रमुख वजहें सामने आ रही हैं। पहली चिंता ‘इक्विटी कमेटी’ के गठन को लेकर है। नए नियमों के तहत संस्थानों में बनने वाली इस कमेटी में सामान्य वर्ग के प्रतिनिधित्व को लेकर स्पष्ट प्रावधान नहीं हैं, जिससे छात्रों को आशंका है कि उनकी बात सुनी ही नहीं जाएगी। दूसरी बड़ी चिंता ओबीसी को नियमों में शामिल करने को लेकर है। कुछ छात्रों और संगठनों का कहना है कि इससे पहले से मौजूद आरक्षण व्यवस्था के अलावा एक नया दबाव बनेगा। तीसरी और सबसे अहम चिंता नियमों के संभावित दुरुपयोग की है। सामान्य वर्ग के छात्र पहले भी एससी-एसटी एक्ट के कथित दुरुपयोग के मामलों का हवाला देते हैं और आशंका जताते हैं कि नए UGC नियमों का भी गलत इस्तेमाल हो सकता है। इसी डर के चलते देश के कई विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं।

समर्थन, विरोध और आगे की राह

UGC के नए समानता नियमों को लेकर जहां एक ओर विरोध हो रहा है, वहीं कई शिक्षाविद् और सामाजिक संगठन इसके समर्थन में भी खड़े हैं। समर्थकों का कहना है कि यदि कैंपस में भेदभाव की शिकायतें बढ़ रही हैं, तो उसे रोकने के लिए सख्त नियम जरूरी हैं। उनका मानना है कि डर की बजाय नियमों के सही क्रियान्वयन पर ध्यान देना चाहिए। दूसरी ओर, एक्सपर्ट्स यह भी स्वीकार करते हैं कि बिना संतुलन के कोई भी कानून विवाद को जन्म दे सकता है। डॉ. जयंतीलाल भंडारी जैसे विशेषज्ञों का सुझाव है कि UGC को इन नियमों की समीक्षा करनी चाहिए और सभी वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि समानता का उद्देश्य किसी एक वर्ग के खिलाफ न जाए। फिलहाल, यह साफ है कि UGC के नए समानता नियम सिर्फ एक शैक्षणिक सुधार नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा बन चुके हैं, जिसका असर आने वाले समय में देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर गहराई से पड़ेगा।

 

Read More-शंकराचार्य विवाद के बीच मथुरा पहुंचे BJP अध्यक्ष नितिन नबीन, योगी आदित्यनाथ की तारीफ ने दिए बड़े सियासी संकेत

Related articles

Leave a reply

Please enter your comment!
Please enter your name here

Stay Connected

0FansLike
0FollowersFollow
0FollowersFollow
0SubscribersSubscribe

Latest posts