गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक ऐसे तलाक मामले में फैसला सुनाया है, जिसने आम लोगों का ध्यान खींचा है। यह मामला पति और पत्नी के बीच खाने की आदतों को लेकर हुए मतभेदों से जुड़ा था। पति का कहना था कि उसकी पत्नी धार्मिक कारणों से घर में प्याज और लहसुन का इस्तेमाल नहीं करती थी और उसे भी ऐसा ही खाना खाने के लिए मजबूर किया जाता था। समय के साथ यह बात दोनों के बीच रोज़मर्रा के झगड़ों की वजह बन गई। पति ने दावा किया कि इन मतभेदों के कारण दांपत्य जीवन में तनाव बढ़ता गया और आपसी समझ पूरी तरह खत्म हो गई, जिससे शादी केवल नाम की रह गई।
फैमिली कोर्ट का फैसला और पत्नी की हाईकोर्ट में चुनौती
इस मामले में फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पति की तलाक की अर्जी स्वीकार कर ली थी। कोर्ट का मानना था कि लंबे समय से चले आ रहे मतभेदों और अलग-अलग जीवनशैली के कारण पति-पत्नी का साथ रहना संभव नहीं रह गया है। हालांकि, पत्नी इस फैसले से संतुष्ट नहीं थी और उसने गुजरात हाईकोर्ट में फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। पत्नी का कहना था कि केवल खाने की पसंद या नापसंद को तलाक का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए और उसने कभी जानबूझकर पति को मानसिक रूप से परेशान नहीं किया।
एलिमनी को लेकर पति की क्रॉस अपील और कोर्ट की सुनवाई
इस केस में तलाक के साथ-साथ एलिमनी का मुद्दा भी सामने आया। फैमिली कोर्ट ने पति को पत्नी को 9 जुलाई 2013 से 8 जुलाई 2020 तक हर महीने 8,000 रुपये और इसके बाद 9 जुलाई 2020 से 10,000 रुपये प्रति माह स्थायी भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। पति ने इस आदेश के खिलाफ भी हाईकोर्ट में अपील दायर की। उसका कहना था कि मामले के लंबे समय तक चलने के दौरान परिस्थितियां बदल गई हैं और उसकी आर्थिक जिम्मेदारियां बढ़ चुकी हैं, इसलिए एलिमनी की रकम पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का अंतिम फैसला और वैवाहिक मामलों पर बड़ा संदेश
गुजरात हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें जस्टिस संगीता विशेन और जस्टिस निशा एम ठाकोर शामिल थीं, ने दोनों पक्षों की अपीलों पर सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला सिर्फ प्याज-लहसुन वाले खाने तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक तनाव और असंगति का परिणाम है। हाईकोर्ट ने तलाक के फैसले को बरकरार रखते हुए एलिमनी से जुड़े आदेश में भी कोई बदलाव नहीं किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पति-पत्नी के बीच संबंध पूरी तरह टूट चुके हों और साथ रहने की कोई संभावना न बचे, तो शादी को जबरन बनाए रखना दोनों के लिए नुकसानदायक होता है।
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