उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसी मर्मस्पर्शी घटना सामने आई है, जिसने सरकारी तंत्र की संवेदनहीनता और एक बुजुर्ग महिला के संघर्ष की पराकाष्ठा को जगजाहिर कर दिया है। धनौरा की रहने वाली कुसुम त्यागी पिछले तीन सालों से एक ऐसी जंग लड़ रही थीं, जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप जाए। उन्हें सरकारी फाइलों में ‘मृतक’ घोषित कर दिया गया था। अपनी ही सांसों का सबूत लेकर दर-दर भटकने वाली इस वृद्धा की किस्मत तब बदली, जब उन्होंने पर्दे के ‘राम’ यानी मेरठ के सांसद अरुण गोविल के सामने अपना दुखड़ा सुनाया। एक फोन कॉल और सांसद की सक्रियता ने वह काम कर दिखाया, जो सालों से फाइलों के ढेर में दबा हुआ था।
सरकारी फाइलों का खौफनाक खेल: जब जिंदा महिला बन गई ‘मुर्दा’
धनौरा निवासी कुसुम त्यागी की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी लगती है, लेकिन इसका दर्द बिल्कुल असली है। करीब तीन साल पहले, एक मामूली कागजी लापरवाही या भ्रष्टाचार के चलते कुसुम को सरकारी अभिलेखों में ‘मृत’ दिखा दिया गया। इसका सीधा असर उनकी एकमात्र जीवन रेखा—वृद्धावस्था पेंशन—पर पड़ा। अचानक पेंशन रुक गई और जब वह बैंक और ब्लॉक पहुंचीं, तो उन्हें पता चला कि सरकारी रिकॉर्ड में उनका वजूद खत्म हो चुका है। कुसुम ने अधिकारियों को अपनी देह दिखाई, अपनी धड़कनें सुनाईं और गिड़गिड़ाकर कहा, “मैं भूत नहीं, जिंदा हूं,” लेकिन सिस्टम की बहरी दीवारों ने उनकी एक न सुनी। पिछले 36 महीनों से वह न्याय की आस में सरकारी दफ्तरों की चौखट घिस रही थीं।
कंबल वितरण और ‘राम’ से मुलाकात: न्याय की आखिरी उम्मीद
शनिवार का दिन कुसुम त्यागी की जिंदगी में नई रोशनी लेकर आया। मेरठ के सांसद अरुण गोविल एक कार्यक्रम में गरीबों को कंबल वितरित करने पहुंचे थे। कड़ाके की ठंड और सिस्टम की बेरुखी से ठिठुरती कुसुम त्यागी वहां पहुंचीं और सीधे सांसद के सामने अपनी आपबीती रख दी। उन्होंने रुंधे गले से बताया कि कैसे तीन साल से उन्हें कागजों में मारकर उनकी रोटी छीनी गई है। रामायण में ‘राम’ की भूमिका निभाकर घर-घर में पूजे जाने वाले अरुण गोविल ने उनकी बात को बेहद गंभीरता और संवेदना के साथ सुना। बुजुर्ग महिला की आंखों में आंसू देखकर सांसद का दिल पसीज गया और उन्होंने मौके पर ही कड़ा रुख अपनाने का फैसला किया।
एक फोन कॉल और जिलाधिकारी का एक्शन: सिस्टम में मची खलबली
सांसद अरुण गोविल ने बिना देरी किए मौके से ही जिलाधिकारी (DM) को फोन लगाया। उन्होंने सख्त लहजे में निर्देश दिया कि एक बुजुर्ग महिला को अपने जीवित होने का प्रमाण देने के लिए तीन साल तक भटकना पड़े, यह स्वीकार्य नहीं है। सांसद के निर्देश मिलते ही जिला प्रशासन में हड़कंप मच गया। जिलाधिकारी ने तत्काल मामले का संज्ञान लेते हुए संबंधित ग्राम पंचायत के सेक्रेटरी और अधिकारियों को पीड़ित महिला के घर जाकर समस्या सुलझाने का आदेश दिया। प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं कि कुसुम त्यागी की पेंशन न केवल तुरंत बहाल की जाए, बल्कि इस लापरवाही के लिए जिम्मेदार लोगों पर भी जवाबदेही तय की जाए।
क्या अब सुधरेगा लापरवाह सिस्टम?
सांसद की इस पहल के बाद कुसुम त्यागी के परिवार में खुशी की लहर है। जिलाधिकारी के आदेश के बाद अब अधिकारी उस बुजुर्ग महिला के घर के चक्कर लगा रहे हैं, जिन्हें पहले दफ्तर से भगा दिया जाता था। यह घटना जहाँ एक जनप्रतिनिधि की संवेदनशीलता को दर्शाती है, वहीं सरकारी तंत्र की उस बड़ी खामी को भी उजागर करती है, जहाँ एक जिंदा इंसान को मुर्दा साबित करना आसान है, लेकिन उसे दोबारा जीवित दिखाना पहाड़ चढ़ने जैसा। अब उम्मीद जताई जा रही है कि कुसुम त्यागी को उनका हक जल्द मिलेगा और उन्हें फिर कभी यह साबित नहीं करना पड़ेगा कि वह ‘जिंदा’ हैं।
