कभी-कभी जो दर्द रोज़मर्रा का मान लिया जाता है, वही किसी के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। कर्नाटक के तुमकुरु जिले से आई यह घटना उसी सच्चाई को उजागर करती है। 19 साल की कीर्तना, जो बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर घर से निकली थी, माहवारी और पेट के असहनीय दर्द से जूझ रही थी। परिवार और आसपास के लोग इस दर्द को आम मानते रहे, क्योंकि समाज में आज भी पीरियड्स से जुड़ी तकलीफों को ‘नॉर्मल’ कहकर टाल दिया जाता है। लेकिन कीर्तना के लिए यह दर्द सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक और भावनात्मक बोझ भी बन चुका था। Menstrual Pain Death का यह मामला बताता है कि जब दर्द को बार-बार नजरअंदाज किया जाए, तो वह इंसान को अंदर से तोड़ देता है।
परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
तुमकुरु जिले के उरडीगेरे होबली स्थित ब्याठा गांव में कीर्तना की मौत की खबर फैलते ही सन्नाटा छा गया। मूल रूप से कलाबुरगी जिले के सलहल्लि की रहने वाली कीर्तना दो महीने पहले नौकरी की तलाश में अपने मामा के घर आई थी। काम न मिलने के बावजूद वह हिम्मत नहीं हारी थी, लेकिन भीतर ही भीतर वह उस दर्द से लड़ रही थी जिसे कोई देख नहीं पा रहा था। परिजनों के मुताबिक, माहवारी के दौरान उसका दर्द कई बार इतना बढ़ जाता था कि वह सामान्य काम भी नहीं कर पाती थी। जिस दिन यह दुखद घटना हुई, घर पर कोई मौजूद नहीं था। अकेलेपन और असहनीय पीड़ा के बीच उसकी जिंदगी खत्म हो गई। Menstrual Pain Death की यह खबर सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है।
पुलिस जांच और उठते गंभीर सवाल
घटना की सूचना मिलते ही क्याथासंद्रा पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया। पुलिस ने अप्राकृतिक मृत्यु का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। अधिकारी हर पहलू से मामले को देख रहे हैं ताकि सच्चाई सामने आ सके। लेकिन कानूनी प्रक्रिया से अलग, यह घटना कई बड़े सवाल खड़े करती है। क्या हम महिलाओं के स्वास्थ्य को पर्याप्त महत्व देते हैं? क्या माहवारी के दौरान होने वाले गंभीर दर्द को समय पर मेडिकल जांच की जरूरत समझा जाता है? अक्सर Menstrual Pain Death जैसे मामलों के पीछे एंडोमेट्रियोसिस, हार्मोनल असंतुलन या अन्य गंभीर समस्याएं छिपी होती हैं, जिन्हें समय रहते पहचाना जा सकता है। यह घटना बताती है कि चुप्पी और लापरवाही कितनी महंगी पड़ सकती है।
समाज के लिए सबक: दर्द को ‘नॉर्मल’ कहकर न टालें
कीर्तना की कहानी एक आईना है, जिसमें समाज को खुद को देखना चाहिए। माहवारी आज भी कई परिवारों में खुलकर चर्चा का विषय नहीं बन पाती। लड़कियों को सिखाया जाता है कि दर्द सहना ही उनकी नियति है। लेकिन Menstrual Pain Death का यह मामला बताता है कि दर्द को अनदेखा करना किसी की जिंदगी छीन सकता है। जरूरत है खुलकर बात करने की, समय पर डॉक्टर से सलाह लेने की और मानसिक समर्थन देने की। परिवार, स्कूल और समाज—तीनों की जिम्मेदारी है कि वे महिलाओं के स्वास्थ्य को गंभीरता से लें। अगर यह कहानी किसी को समय रहते सचेत कर दे, तो शायद कीर्तना की खामोश पीड़ा व्यर्थ नहीं जाएगी।
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