केंद्र सरकार ने पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती वैश्विक कीमतों को देखते हुए पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती का ऐलान किया है। इसके तहत पेट्रोल पर प्रति लीटर तीन रुपये की कमी की गई है, जबकि डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क को शून्य कर दिया गया है। यह कदम हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और इंडियन ऑयल (IOC) जैसी तेल विपणन कंपनियों को राहत देने के उद्देश्य से लिया गया है। सरकार का कहना है कि इससे तेल कंपनियों को वित्तीय बोझ कम करने में मदद मिलेगी, लेकिन इसका असर आम उपभोक्ताओं तक तुरंत नहीं पहुंचेगा।
कांग्रेस का पहला रिएक्शन
सरकार की इस घोषणा पर कांग्रेस ने शुक्रवार को पहला रिएक्शन दिया। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि यह कदम चुनावी फायदा पाने के लिए उठाया गया है। रमेश ने ट्वीट में कहा कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें गिरने पर भी पिछले 12 सालों में भारत में उपभोक्ता कीमतें कम नहीं हुईं। उन्होंने लोगों से अपील की कि 30 अप्रैल तक इंतजार करें, क्योंकि पश्चिम बंगाल में 29 अप्रैल को दूसरे और अंतिम चरण का चुनाव संपन्न होगा। उनका इशारा साफ था कि यह राहत आम जनता के लिए नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति का हिस्सा है।
उपभोक्ताओं को राहत सिर्फ कहानियों में
कांग्रेस के मीडिया विभाग प्रमुख पवन खेड़ा ने भी सरकार की घोषणा पर आलोचना की। उन्होंने कहा कि अगर किसी ने पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम होने की सुर्खियां देखीं और सोचा कि सरकार ने उनकी जेब को राहत दी है, तो वह गलत है। वास्तव में, विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क में कटौती केवल तेल कंपनियों द्वारा सरकार को दिए जाने वाले हिस्से पर की गई है। खेड़ा ने कहा कि वैश्विक तेल संकट के कारण कंपनियों को घाटा हो रहा था, और सरकार ने केवल उनका बोझ थोड़ा साझा किया है। उन्होंने चेतावनी दी कि वास्तविक उपभोक्ता राहत के बजाय यह केवल सुर्खियों की कहानी बन गई है।
सरकार की घोषणा और जनता का नजरिया
सरकार की यह घोषणा न केवल तेल कंपनियों को राहत देती है, बल्कि राजनीतिक दृष्टि से भी चर्चा का विषय बन गई है। कांग्रेस का कहना है कि यह कदम चार राज्यों और एक केंद्रशासित प्रदेश में विधानसभा चुनावों को देखते हुए उठाया गया है। वहीं, आम जनता को इस बदलाव का तुरंत लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि कीमतों में वास्तविक गिरावट उपभोक्ताओं तक पहुँचने में समय लगेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि चुनावी मौसम में ऐसे कदम आम होते हैं, लेकिन जनता की जेब को राहत देने के लिए स्थायी और व्यापक उपायों की आवश्यकता है।
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