सुप्रीम कोर्ट में बुधवार (25 मार्च 2026) को एक सुनवाई के दौरान ऐसा माहौल बन गया, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह गया। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत एक मामले की सुनवाई कर रहे थे, तभी उन्होंने बेहद कड़े शब्दों में याचिकाकर्ता पक्ष को फटकार लगा दी। मामला उस वक्त और गंभीर हो गया जब CJI को यह पता चला कि याचिकाकर्ता के पिता ने उनके निजी दायरे में दखल देते हुए उनके भाई को फोन किया था। इस बात से CJI स्पष्ट रूप से नाराज हो गए और उन्होंने कोर्ट में ही सख्त चेतावनी दे डाली। उन्होंने कहा कि यह न केवल अदालत की गरिमा के खिलाफ है बल्कि न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप की कोशिश भी है। उनका गुस्सा इतना तीखा था कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर कोई व्यक्ति देश छोड़कर भी भाग जाए, तब भी कानून से बच नहीं सकता।
बौद्ध माइनॉरिटी कोटे से जुड़ा है पूरा विवाद
दरअसल, यह पूरा मामला दो जनरल कैटेगरी के उम्मीदवारों से जुड़ा है, जिन्होंने उत्तर प्रदेश के सुभारती मेडिकल कॉलेज में पोस्ट ग्रेजुएशन में दाखिले के लिए बौद्ध माइनॉरिटी कोटे का सहारा लिया है। इन उम्मीदवारों का दावा है कि वे बौद्ध धर्म अपना चुके हैं और उनके पास इसके लिए सब-डिविजनल ऑफिसर द्वारा जारी प्रमाण पत्र भी मौजूद है। लेकिन अदालत को इस दावे पर संदेह है। इससे पहले जनवरी में भी जब इस मामले की सुनवाई हुई थी, तब कोर्ट ने साफ कहा था कि धर्म परिवर्तन की मंशा पर सवाल उठते हैं और यह जांच जरूरी है कि कहीं यह केवल एडमिशन पाने के लिए तो नहीं किया गया। अदालत ने यह भी नोट किया था कि दोनों याचिकाकर्ता मूल रूप से पुनिया जाति से आते हैं, जिससे उनके दावे पर और सवाल खड़े होते हैं।
‘अवमानना क्यों न चलाएं?’— CJI की सख्त टिप्पणी
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील से सीधा सवाल किया कि आखिर उनके मुवक्किल के खिलाफ अदालत की अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा कि किसी जज के परिवार से संपर्क करना पूरी तरह से अनुचित है और यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है। CJI ने यह भी कहा कि अगर कोई व्यक्ति इस तरह का व्यवहार करता है तो उसके वकील को भी मामले से अलग हो जाना चाहिए। हालांकि, वकील ने कोर्ट को बताया कि उन्हें इस पूरे घटनाक्रम की कोई जानकारी नहीं थी और उन्होंने इसके लिए माफी भी मांगी। लेकिन CJI ने साफ कर दिया कि इस तरह की हरकत को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए।
न्यायपालिका की गरिमा और नियमों पर फिर उठे सवाल
इस घटना ने एक बार फिर न्यायपालिका की गरिमा और उसकी स्वतंत्रता को लेकर चर्चा तेज कर दी है। अदालत में इस तरह की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि कुछ लोग न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं, जो बेहद गंभीर मामला है। CJI सूर्यकांत का सख्त रुख इस बात को दर्शाता है कि न्यायपालिका ऐसे मामलों में किसी भी तरह की ढील देने के मूड में नहीं है। साथ ही, यह मामला धर्म परिवर्तन और आरक्षण के दुरुपयोग जैसे संवेदनशील मुद्दों को भी उजागर करता है। अब सबकी नजर इस पर टिकी है कि कोर्ट इस मामले में आगे क्या फैसला सुनाता है और क्या याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई होती है।
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