Thursday, February 5, 2026
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20 साल बाद जेल से बाहर आएगा अबू सलेम! भाई की मौत के बाद हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी देश की नजरें

1993 मुंबई बम धमाकों का दोषी अंडरवर्ल्ड डॉन सलेम भाई के निधन पर 14 दिन की पैरोल चाहता है, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने सिर्फ 2 दिन का विकल्प रखा है।

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1993 के मुंबई बम धमाकों के दोषी और पिछले करीब 20 वर्षों से जेल में बंद कुख्यात अंडरवर्ल्ड गैंगस्टर अबू सलेम एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार वजह कोई आपराधिक मामला नहीं, बल्कि उसके बड़े भाई का निधन है। भाई की मौत के बाद अंतिम संस्कार और अन्य धार्मिक रस्मों में शामिल होने के लिए सालेम ने 14 दिनों की आपातकालीन पैरोल की मांग की है। सालेम फिलहाल महाराष्ट्र की जेल में बंद है और उसने इस मांग को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उसका कहना है कि भाई की मृत्यु परिवार के लिए गहरा सदमा है और एक बेटे व भाई के तौर पर उसे अंतिम संस्कार और रस्मों में शामिल होने का हक मिलना चाहिए। यह मामला अब सिर्फ एक कैदी की पैरोल का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन का बन गया है।

सरकार का सख्त रुख: 14 दिन नहीं, सिर्फ 2 दिन का विकल्प

महाराष्ट्र सरकार ने अबू सलेम की 14 दिन की पैरोल मांग का कड़ा विरोध किया है। सरकार का साफ कहना है कि अबू सलेम कोई साधारण अपराधी नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय अपराधी और आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ा व्यक्ति है। ऐसे में उसे इतने लंबे समय तक जेल से बाहर रखना सुरक्षा के लिहाज से बेहद जोखिम भरा हो सकता है। सरकार ने अदालत में यह भी स्पष्ट किया कि अगर पैरोल देनी ही है, तो वह केवल दो दिनों के लिए और वह भी कड़ी पुलिस सुरक्षा में दी जा सकती है। इसके अलावा, सरकार ने यह शर्त भी रखी है कि पुलिस सुरक्षा का पूरा खर्च खुद अबू सलेम को उठाना होगा। सरकार का तर्क है कि लंबे समय की पैरोल से सुरक्षा एजेंसियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा और किसी भी तरह की चूक गंभीर परिणाम ला सकती है।

वकीलों की दलील: दो दिन में आजमगढ़ जाना अव्यावहारिक

अबू सलेम की ओर से पेश वकीलों ने सरकार के दो दिन के प्रस्ताव को अव्यावहारिक बताया है। उन्होंने अदालत को बताया कि सालेम को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जाना है, जहां उसके भाई का अंतिम संस्कार और अन्य रस्में होनी हैं। वकीलों का कहना है कि मुंबई से आजमगढ़ जाना और फिर वापस लौटना, वह भी पुलिस सुरक्षा के साथ, केवल दो दिनों में संभव नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि अंतिम संस्कार के बाद कई धार्मिक और पारिवारिक रस्में होती हैं, जिनमें समय लगता है और परिवार की मौजूदगी जरूरी मानी जाती है। वकीलों ने यह भी कहा कि सलेम पिछले दो दशकों से जेल में है और इस दौरान उसने पैरोल का दुरुपयोग नहीं किया है। ऐसे में मानवीय आधार पर उसे 14 दिन की मोहलत दी जानी चाहिए।

हाईकोर्ट की सख्ती और आगे का रास्ता

इस पूरे मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने फिलहाल कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है, लेकिन राज्य सरकार को कड़ा निर्देश जरूर दिया है। कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह 14 दिन की पैरोल न देने के अपने कारणों और सुरक्षा से जुड़ी सभी चिंताओं को एक विस्तृत हलफनामे के जरिए अदालत में पेश करे। गौरतलब है कि अबू सलेम के बड़े भाई का निधन नवंबर महीने में हुआ था। उस समय सालेम ने जेल अधिकारियों से पैरोल की मांग की थी, लेकिन उसे खारिज कर दिया गया था। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया। अब इस मामले में अदालत का अंतिम फैसला क्या होगा, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं। यह फैसला न केवल अबू सलेम के लिए, बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए भी एक अहम मिसाल बन सकता है, जहां मानवीय भावनाएं और राष्ट्रीय सुरक्षा आमने-सामने खड़ी होती हैं।

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