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क्या पीएम मोदी की एक ‘फोन कॉल’ रोक देगी ईरान-इजराइल महायुद्ध? अमेरिकी कर्नल ने ट्रंप को दी ऐसी सलाह कि कांप उठा चीन!

 ईरान-इजराइल जंग के बीच दुनिया को याद आए पीएम मोदी! फिनलैंड के राष्ट्रपति से लेकर अमेरिकी कर्नल तक ने आखिर क्यों कहा कि भारत की एक फोन कॉल रोक सकती है महायुद्ध? जानिए पूरी इनसाइड स्टोरी।

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PM Narendra Modi: दुनिया इस वक्त तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़ी है। ईरान और इजराइल के बीच जारी भीषण संघर्ष को 18 दिन बीत चुके हैं, लेकिन शांति की कोई किरण नजर नहीं आ रही। मिसाइलों के शोर और धमाकों के बीच अब पूरी दुनिया की निगाहें एक ही शख्स पर टिकी हैं—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि जो काम संयुक्त राष्ट्र (UN) और दुनिया की महाशक्तियां नहीं कर पाईं, वह भारत कर सकता है। फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब ने हाल ही में नई दिल्ली के ‘रायसीना डायलॉग 2026’ में एक ऐसा बयान दिया जिसने ग्लोबल पॉलिटिक्स में हलचल मचा दी है। उन्होंने साफ कहा कि भारत और PM Narendra Modi पर दोनों पक्षों (ईरान और इजराइल) का अटूट भरोसा है। सवाल अब यह है कि क्या वाकई नई दिल्ली इस बार दुनिया के लिए ‘संकटमोचक’ बनेगी?

डगलस मैकग्रेगर का बड़ा खुलासा

इस युद्ध के बीच अमेरिकी सेना के रिटायर्ड कर्नल और अनुभवी रणनीतिकार डगलस मैकग्रेगर ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को एक चौंकाने वाली सलाह दी है। मैकग्रेगर ने चेतावनी दी है कि अमेरिका के मिसाइल भंडार खाली हो रहे हैं और अगर जल्द ही कूटनीतिक समाधान नहीं निकला, तो दुनिया को 300 डॉलर प्रति बैरल वाले तेल संकट का सामना करना होगा, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को तबाह कर देगा। उन्होंने ट्रंप से कहा, “अगर इस युद्ध को रोकना है, तो पीएम मोदी को फोन मिलाइए।” मैकग्रेगर का तर्क है कि भारत के इजराइल, ईरान और चीन तीनों के साथ बेहद संतुलित संबंध हैं। पीएम मोदी की छवि एक ऐसे नेता की है जो किसी को भी नाराज किए बिना कड़वी सच्चाई बोल सकते हैं। यही वजह है कि यूएई के पूर्व राजदूत हुसैन हसन मिर्जा ने भी माना कि PM Narendra Modi का इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू और ईरानी नेतृत्व को किया गया एक फोन कॉल ही इस जंग को ‘फुल स्टॉप’ लगा सकता है।

चीन की चाल बनाम भारत की निष्पक्षता: क्यों फेल हुआ बीजिंग?

मिडिल ईस्ट के इस संकट में चीन ने भी मध्यस्थता की पेशकश की थी, लेकिन दुनिया ने उसे सिरे से नकार दिया। इसकी सबसे बड़ी वजह है ‘निष्पक्षता’ की कमी। चीन दशकों से खुलकर ईरान के साथ खड़ा रहा है, ऐसे में इजराइल उस पर भरोसा करने का जोखिम कभी नहीं उठाएगा। इसके उलट, भारत ने आजादी के बाद से ही अपनी ‘गुटनिरपेक्ष’ छवि को बनाए रखा है। भारत ने जहां एक तरफ इजराइल के साथ रक्षा और तकनीक के क्षेत्र में गहरी साझेदारी की है, वहीं ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और ऊर्जा संबंधों को भी आंच नहीं आने दी। भारत ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है और चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए दोनों देशों के हित जुड़े हुए हैं। यही वह ‘न्यूट्रल ग्राउंड’ है जो पीएम मोदी को दुनिया का सबसे प्रभावशाली मध्यस्थ बनाता है।

सुरक्षा और स्थिरता का ‘इंडियन मॉडल’

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पहले ही इस दिशा में सक्रिय कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। 28 फरवरी को जंग शुरू होने के महज दो दिन बाद उन्होंने नेतन्याहू से बात की और संघर्ष को जल्द समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके बाद उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेज़ेशकियन से भी टेलीफोन पर विस्तार से चर्चा की। पेज़ेशकियन ने मोदी को ईरान का दृष्टिकोण समझाया, जिस पर पीएम मोदी ने स्पष्ट कहा कि ‘यह युद्ध का युग नहीं है’ और सभी मसलों का हल सिर्फ बातचीत और कूटनीति से ही संभव है। दुनिया अब यह देख रही है कि भारत केवल एक मूकदर्शक नहीं है, बल्कि एक ‘विश्व बंधु’ की भूमिका निभा रहा है। अगर भारत इस युद्ध को रुकवाने में सफल रहता है, तो यह न केवल पीएम मोदी की व्यक्तिगत जीत होगी, बल्कि 21वीं सदी में भारत के ‘सुपरपावर’ बनने की मुहर भी होगी।

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