ईरान में सत्ता का सबसे बड़ा पद अचानक खाली हो जाने की खबरों ने देश ही नहीं, पूरे पश्चिम एशिया की राजनीति को झकझोर दिया है। सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन की रिपोर्ट्स के बाद उत्तराधिकार को लेकर गंभीर हलचल शुरू हो गई है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर तेजी से मंथन चल रहा है और इस बीच उनके बेटे मोजतबा खामेनेई का नाम सबसे आगे बताया जा रहा है। हालांकि आधिकारिक पुष्टि अभी तक सामने नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि ईरान का अगला सुप्रीम लीडर कौन होगा।
तेजी से फैसले की कोशिश, संवैधानिक प्रक्रिया पर सवाल
ईरान के संविधान के मुताबिक सुप्रीम लीडर का चयन 88 सदस्यीय ‘विशेषज्ञों की परिषद’ करती है, जिसे धार्मिक विद्वानों का सर्वोच्च निकाय माना जाता है। यही परिषद ‘विलायत-ए-फकीह’ सिद्धांत के तहत देश के सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक पद के लिए योग्य व्यक्ति का चयन करती है। लेकिन मौजूदा हालात में यह प्रक्रिया कितनी सहज होगी, इस पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स, यानी Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) जल्द से जल्द नए सुप्रीम लीडर की घोषणा चाहता है।
सूत्रों का दावा है कि देश में बढ़ते अस्थिर माहौल और बाहरी खतरों को देखते हुए IRGC पारंपरिक संवैधानिक प्रक्रिया का इंतजार किए बिना तेज निर्णय लेने के पक्ष में है। बताया जा रहा है कि शीर्ष कमांड संरचना के भीतर रविवार सुबह तक उत्तराधिकारी के नाम पर सहमति बनाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। हालांकि यह साफ नहीं है कि परिषद की औपचारिक बैठक कब और कैसे होगी।
मोजतबा खामेनेई का नाम क्यों चर्चा में?
उत्तराधिकार की दौड़ में मोजतबा खामेनेई का नाम सबसे ज्यादा सुर्खियों में है। वे लंबे समय से सत्ता प्रतिष्ठान के भीतर प्रभावशाली माने जाते रहे हैं। हालांकि वे औपचारिक रूप से किसी बड़े सार्वजनिक पद पर नहीं रहे, लेकिन राजनीतिक और धार्मिक हलकों में उनकी पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जाता। विश्लेषकों का मानना है कि अगर उन्हें सुप्रीम लीडर बनाया जाता है तो यह ईरान में पहली बार होगा जब सत्ता लगभग वंशानुगत रूप में हस्तांतरित होती दिखाई देगी।
लेकिन यही संभावना कई सवाल भी खड़े कर रही है। क्या वे देश के भीतर मौजूद अलग-अलग धार्मिक गुटों और शक्तिशाली संस्थानों को साथ रख पाएंगे? क्या उन्हें वही धार्मिक वैधता मिल पाएगी जो अयातुल्ला अली खामेनेई को प्राप्त थी? और सबसे अहम—क्या जनता इस फैसले को स्वीकार करेगी? इन सवालों के जवाब आने वाले दिनों में सामने आ सकते हैं।
सुरक्षा तंत्र में हलचल, कमांड चेन पर असर
खबरों के अनुसार खामेनेई के निधन की सूचना के बाद सुरक्षा और सैन्य ढांचे में भी हलचल बढ़ गई है। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कमांड चेन के भीतर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। आदेशों के आदान-प्रदान में देरी और फील्ड स्तर पर निर्णय लेने में कठिनाई जैसी स्थितियां सामने आ रही हैं। यह भी कहा जा रहा है कि कुछ सैन्य अधिकारी संभावित बाहरी हमलों की आशंका से सतर्क हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका और इज़राइल की ओर से संभावित सैन्य दबाव को लेकर भी सतर्कता बढ़ी हुई है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्रीय हालात पहले से ही संवेदनशील बने हुए हैं। ऐसे समय में सुप्रीम लीडर का पद खाली होना देश के लिए एक बड़ी चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
जनता की प्रतिक्रिया और संभावित विरोध की आशंका
सत्ता परिवर्तन के इस दौर में एक और चिंता सामने आ रही है—जनता की प्रतिक्रिया। विश्लेषकों का मानना है कि जैसे ही नए नेता की घोषणा होगी, देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध प्रदर्शन की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक कठिनाइयों और सामाजिक प्रतिबंधों को लेकर कई बार विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं।
यदि उत्तराधिकार की प्रक्रिया को पारदर्शी और संवैधानिक ढंग से पूरा नहीं किया गया, तो असंतोष और गहरा सकता है। IRGC और धार्मिक संस्थानों के लिए यह सबसे बड़ी परीक्षा होगी कि वे स्थिरता बनाए रखते हुए सत्ता हस्तांतरण को सुचारु रूप से अंजाम दें।
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