रमजान का महीना अमन, सब्र और रहमत का पैगाम लेकर आता है। इस दौरान मुस्लिम समुदाय रोज़ा रखकर खुदा से शांति और भाईचारे की दुआ करता है। लेकिन इसी पवित्र महीने में Pakistan और Afghanistan के बीच तनाव ने इंसानियत को झकझोर देने वाली तस्वीर पेश कर दी। सीमावर्ती इलाकों में हुए हवाई हमलों और गोलीबारी ने आम लोगों की ज़िंदगी तहस-नहस कर दी। घर उजड़ गए, परिवार बिखर गए और कई मासूमों की दुनिया एक पल में खत्म हो गई। इन्हीं दर्दनाक कहानियों में एक नाम है—आठ साल का नूर आलम, जिसकी आंखों के आंसू आज पूरी दुनिया से सवाल कर रहे हैं।
एक हमले ने छीन लिया पूरा परिवार
बताया जा रहा है कि अफगानिस्तान के Nangarhar इलाके में हुए हवाई हमलों में नूर आलम ने अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों को खो दिया। कुछ ही पलों में उसका हंसता-खेलता घर मलबे में बदल गया। नूर इस हमले में अकेला जिंदा बचा, लेकिन उसकी मासूम आंखों में अब डर और सन्नाटा बस गया है। जिस उम्र में बच्चे खिलौनों और स्कूल की बात करते हैं, उस उम्र में नूर मौत, तबाही और अकेलेपन का सामना कर रहा है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, हमलों के बाद पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई और कई परिवार अपने अपनों को ढूंढते नजर आए।
आठ साल के नूर आलम का पूरा परिवार नंगरहार में पाकिस्तानी एयरस्ट्राइक में मारा गया, पाकिस्तान की बर्बरता का कोई अंत नहीं। pic.twitter.com/C6YvlI0eoD
— Shyam Prakash (@iShyamPrakash) February 26, 2026
वायरल वीडियो और लोगों का गुस्सा
नूर आलम का रोता हुआ वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर सामने आया, लोगों की भावनाएं उमड़ पड़ीं। किसी ने इसे रमजान की रूह के खिलाफ बताया तो किसी ने इसे इंसानियत पर धब्बा कहा। कई यूजर्स ने लिखा कि इबादत के महीने में बम और गोलियों की आवाज़ें दिल दहला देने वाली हैं। कुछ लोगों ने यह भी कहा कि नूर के आंसू सिर्फ उसके नहीं, बल्कि उन तमाम बेगुनाहों की चीख हैं जो इस जंग की आग में झुलस रहे हैं। वीडियो ने यह साफ कर दिया कि जंग का सबसे बड़ा नुकसान आम लोग और मासूम बच्चे ही उठाते हैं, जिनका किसी राजनीति या सरहद से कोई लेना-देना नहीं होता।
सवाल जो रह गए, जवाब का इंतज़ार
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर दुनिया के सामने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर जंग का रास्ता कब बदलेगा? रमजान जैसे पाक महीने में भी अगर बच्चों की दुनिया उजड़ रही है, तो इंसानियत की जीत कैसे होगी? नूर आलम आज अकेला है, लेकिन उसकी कहानी अकेली नहीं है। ऐसे न जाने कितने नूर हैं, जिनकी ज़िंदगी जंग ने अंधेरे में धकेल दी है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय से लेकर आम लोगों तक, हर कोई अब यही पूछ रहा है कि क्या इन मासूम आंसुओं की कीमत पर ही सियासत चलती रहेगी, या कभी शांति की सुबह भी आएगी?
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