दक्षिण-पूर्व एशिया की राजनीति में उस वक्त हलचल तेज हो गई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से थाईलैंड और कंबोडिया के बीच युद्धविराम की घोषणा की। यह दावा ऐसे समय सामने आया, जब दोनों देशों की सीमा पर पहले से ही सैन्य गतिविधियों और बयानबाज़ी का माहौल गरम था। ट्रंप के ऐलान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर तनाव कम करने की कोशिश के तौर पर देखा गया, लेकिन यह राहत ज्यादा देर टिक नहीं पाई। कंबोडिया ने कुछ ही घंटों के भीतर आरोप लगाया कि युद्धविराम पर सहमति बनने के बावजूद थाईलैंड ने उसके सीमावर्ती इलाकों में हवाई हमले जारी रखे। इन आरोपों ने न सिर्फ ट्रंप के दावे पर सवाल खड़े किए, बल्कि यह भी दिखाया कि ज़मीनी हालात कूटनीतिक घोषणाओं से कितने अलग हो सकते हैं। कंबोडियाई अधिकारियों के मुताबिक, हमलों की आवाज़ें रात तक सुनाई देती रहीं, जिससे सीमावर्ती गांवों में दहशत फैल गई और लोग सुरक्षित स्थानों की तलाश में निकल पड़े।
कंबोडिया का आरोप और थाईलैंड की चुप्पी
कंबोडिया की ओर से लगाए गए आरोपों ने पूरे घटनाक्रम को और संवेदनशील बना दिया है। कंबोडियाई रक्षा सूत्रों का कहना है कि युद्धविराम की घोषणा के बाद भी थाई सैन्य विमानों ने सीमा के पास उड़ानें भरीं और कुछ इलाकों में बमबारी की गई। सरकार ने इसे “समझौते का सीधा उल्लंघन” बताया और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की। दूसरी ओर, थाईलैंड की ओर से शुरुआती घंटों में कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई, जिससे अटकलें और तेज हो गईं। विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह की चुप्पी रणनीतिक हो सकती है, लेकिन इससे अविश्वास का माहौल और गहराता है। सीमा से जुड़े पुराने विवाद, ऐतिहासिक दावे और संसाधनों पर नियंत्रण की होड़ इस टकराव को और जटिल बना देती है। कंबोडिया ने यह भी कहा कि यदि हालात नहीं संभले तो वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर औपचारिक शिकायत दर्ज कराएगा, जिससे मामला क्षेत्रीय से वैश्विक चर्चा का विषय बन सकता है।
ट्रंप की भूमिका पर उठते सवाल
डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किए गए युद्धविराम के ऐलान को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं। क्या यह घोषणा दोनों देशों की औपचारिक सहमति के बाद की गई थी, या फिर यह एक कूटनीतिक संकेत भर था? जानकारों का कहना है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में ज़मीनी स्तर पर स्पष्ट और लिखित समझौते के बिना किसी भी सार्वजनिक ऐलान का असर सीमित रहता है। ट्रंप इससे पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अप्रत्याशित घोषणाओं के लिए जाने जाते रहे हैं, और इस बार भी वही शैली चर्चा में है। कंबोडिया के आरोपों ने यह धारणा मजबूत की है कि केवल बाहरी मध्यस्थता से तनाव तुरंत खत्म नहीं होता। क्षेत्रीय शक्तियों और आसियान जैसे संगठनों की भूमिका यहां अहम मानी जा रही है, क्योंकि वे स्थानीय हालात और ऐतिहासिक संदर्भ को बेहतर समझते हैं। ट्रंप के प्रयासों को जहां कुछ लोग शांति की दिशा में कदम मानते हैं, वहीं आलोचक इसे अधूरी तैयारी और जल्दबाज़ी का नतीजा बता रहे हैं।
सीमा पर तनाव और आगे की राह
थाईलैंड-कंबोडिया सीमा पर बढ़ता तनाव सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया की सुरक्षा और स्थिरता पर पड़ सकता है। सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले आम नागरिक सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं, जिनके लिए हर नई गोलीबारी या हवाई गतिविधि डर लेकर आती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आरोप-प्रत्यारोप का यह दौर यूं ही चलता रहा, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। कूटनीतिक स्तर पर बातचीत, पारदर्शी जांच और विश्वसनीय निगरानी तंत्र ही इस संकट से निकलने का रास्ता दिखा सकते हैं। फिलहाल, ट्रंप के युद्धविराम दावे और कंबोडिया के गंभीर आरोपों के बीच सच्चाई धुंधली नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि क्या दोनों देश संवाद की मेज पर लौटते हैं या सीमा पर बमों की गूंज एक बार फिर पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेती है।
