अमेरिका और ईरान के बीच Islamabad में हुई अहम शांति वार्ता बिना किसी समझौते के खत्म हो गई है। करीब 21 घंटे तक चली इस मैराथन बातचीत से उम्मीद थी कि दोनों देशों के बीच तनाव कम होगा और खासकर Strait of Hormuz को लेकर कोई रास्ता निकलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने साफ कहा कि ईरान ने अमेरिकी शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। वहीं ईरान का कहना है कि अमेरिका की मांगें बहुत ज्यादा और अस्वीकार्य थीं। इस टकराव के कारण बातचीत पूरी तरह बेनतीजा रही और अब हालात पहले जैसे ही बने हुए हैं।
दोनों देश अपनी शर्तों पर अड़े
इस वार्ता के विफल होने की सबसे बड़ी वजह दोनों देशों का अपने-अपने रुख से पीछे न हटना रहा। अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और रणनीतिक नियंत्रण को लेकर स्पष्ट और सख्त प्रतिबद्धता दे। दूसरी ओर ईरान इसे अपने अधिकार और सुरक्षा से जोड़कर देख रहा है। ईरान का कहना है कि वह किसी दबाव में आकर अपनी नीतियों से समझौता नहीं करेगा। इसी जिद के कारण कोई मध्य रास्ता नहीं निकल पाया और बातचीत टूट गई। इस असफलता ने यह साफ कर दिया है कि दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी अभी भी बहुत गहरी है।
होर्मुज स्ट्रेट पर क्या है मौजूदा स्थिति?
सबसे बड़ा सवाल अब Strait of Hormuz को लेकर उठ रहा है। ईरान की सैन्य इकाई इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) ने संकेत दिए हैं कि मौजूदा स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा। इसका मतलब है कि यह अहम समुद्री रास्ता आगे भी आंशिक या पूरी तरह बंद रह सकता है। गौरतलब है कि दुनिया का करीब 20 प्रतिशत कच्चा तेल Strait of Hormuz से गुजरता है। अगर यह रास्ता बाधित रहता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई, पेट्रोल-डीजल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ेगा। पहले सीजफायर के दौरान सीमित जहाजों को गुजरने की अनुमति दी गई थी, लेकिन हालात फिर बिगड़ने के बाद वह व्यवस्था भी खत्म हो गई।
आगे क्या होगा? दुनिया की नजर अगले कदम पर
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आगे क्या होगा और क्या यह संकट और गहराएगा। जब तक अमेरिका और ईरान के बीच नई बातचीत या कोई ठोस समझौता नहीं होता, तब तक होर्मुज स्ट्रेट के पूरी तरह खुलने की संभावना बेहद कम है। ईरान इस रणनीतिक रास्ते पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहता है, जबकि अमेरिका इसे वैश्विक व्यापार के लिए खुला देखना चाहता है। इस टकराव का असर सिर्फ इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। फिलहाल हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं और आने वाले दिनों में कोई भी फैसला वैश्विक स्तर पर बड़ा असर डाल सकता है।
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