इस नए घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत-पाक तनाव की पुरानी फाइलें खोल दी हैं। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत की ओर से चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर को अब करीब सात महीने बीत चुके हैं, लेकिन उसकी गूंज अब भी पाकिस्तान के सत्ता और सैन्य गलियारों में सुनाई दे रही है। चार दिनों तक चले इस सैन्य अभियान में भारत ने जिस तरह मिसाइल और सटीक सैन्य कार्रवाई से दबाव बनाया था, उसने पाकिस्तान को रणनीतिक और मानसिक दोनों स्तरों पर झकझोर दिया। उसी संघर्ष को याद करते हुए अब पाकिस्तान के सेना प्रमुख और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने ऐसा बयान दिया है, जिसने न सिर्फ राजनीतिक हलकों बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई बहस छेड़ दी है। मुनीर ने कहा कि उस टकराव के दौरान पाकिस्तान ने ‘ईश्वरीय हस्तक्षेप’ महसूस किया और अल्लाह की मदद से ही हालात संभाले जा सके।
इस्लामाबाद की उलेमा कॉन्फ्रेंस और वायरल वीडियो
यह बयान किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस या आधिकारिक सैन्य मंच से नहीं, बल्कि धार्मिक मंच से सामने आया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वीडियो 10 दिसंबर को इस्लामाबाद में आयोजित नेशनल उलेमा कॉन्फ्रेंस का बताया जा रहा है। इस कार्यक्रम में मुल्ला मुनीर यानी आसिम मुनीर, सामने बैठे धार्मिक विद्वानों और उलेमाओं को संबोधित कर रहे थे। वीडियो में वह कुरान की आयतें पढ़ते हुए दिखाई देते हैं और फिर भारत के साथ मई महीने में हुए संघर्ष का जिक्र करते हैं। उन्होंने कहा कि उस समय हालात बेहद गंभीर थे, लेकिन पाकिस्तान को अल्लाह की खास मदद मिली। इस वीडियो को सहयोगी वेबसाइट WION के पत्रकार सिद्धांत सिब्बल ने साझा किया, जिसके बाद यह तेजी से वायरल हो गया। वीडियो के सार्वजनिक होते ही पाकिस्तान की सैन्य सोच, धार्मिक बयानबाजी और भारत के खिलाफ नैरेटिव को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गईं।
‘अल्लाह की मदद’ और ‘फरिश्तों’ का दावा
मुल्ला मुनीर के बयान का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा वह दावा है, जिसमें उन्होंने कहा कि भारत के साथ संघर्ष के दौरान उन्हें खुद ‘अल्लाह की मदद’ का एहसास हुआ। उन्होंने मंच से कहा कि ऐसा लग रहा था मानो जंग के मैदान में फरिश्ते उतरने को तैयार हों। यह बयान ऐसे समय आया है जब ऑपरेशन सिंदूर को लेकर पाकिस्तान के भीतर अब तक कोई ठोस सैन्य सफलता का विवरण सामने नहीं आया है। भारत की कार्रवाई के बाद पाकिस्तान ने आधिकारिक तौर पर भले ही संयमित बयान दिए हों, लेकिन पर्दे के पीछे इस संघर्ष को लेकर असहजता साफ देखी गई। विश्लेषकों का मानना है कि धार्मिक संदर्भों का सहारा लेकर सैन्य नेतृत्व अपने घरेलू दर्शकों को यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि पाकिस्तान किसी रणनीतिक चूक से नहीं, बल्कि ‘ईश्वरीय संरक्षण’ के कारण बच पाया। यह बयान भारत की उस सैन्य बढ़त को अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार करने जैसा भी माना जा रहा है, जिसने महज चार दिनों में दबाव की स्थिति बना दी थी।
भारत-पाक रिश्तों और भविष्य के संकेत
मुल्ला मुनीर का यह बयान सिर्फ एक धार्मिक टिप्पणी नहीं, बल्कि भारत-पाक संबंधों के भविष्य की दिशा को भी संकेत देता है। जब सैन्य संघर्षों को धार्मिक रंग दिया जाता है, तो उससे तनाव और गहरा होने का खतरा बढ़ जाता है। भारत पहले ही साफ कर चुका है कि आतंकवाद और सीमा पार से होने वाली हरकतों पर उसकी नीति ‘जीरो टॉलरेंस’ की है। ऑपरेशन सिंदूर उसी नीति का प्रत्यक्ष उदाहरण था। अब पाकिस्तान के शीर्ष सैन्य अधिकारी द्वारा अल्लाह और फरिश्तों के जिक्र के साथ उस संघर्ष को याद करना यह दर्शाता है कि उस अभियान की मानसिक छाप अभी भी बनी हुई है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि पाकिस्तान इस तरह की बयानबाजी तक सीमित रहता है या फिर इससे उसकी रणनीति और बयान और आक्रामक होते हैं। फिलहाल इतना तय है कि ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ चार दिनों का सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि वह ऐसा संदेश था, जिसकी गूंज महीनों बाद भी इस्लामाबाद के मंचों से सुनाई दे रही है।
