बिहार की राजनीति एक बार फिर उस वक्त गरमा गई जब महिला डॉक्टर के हिजाब से जुड़े विवाद पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से दिल्ली एयरपोर्ट पर सीधे सवाल पूछे गए। जैसे ही मुख्यमंत्री राजधानी पहुंचे, वहां मौजूद मीडिया ने उनसे महिला डॉक्टर का हिजाब खींचने के आरोपों पर प्रतिक्रिया जाननी चाही। सवाल था सीधा—“क्या आप माफी मांगेंगे?” लेकिन जवाब में न तो कोई बयान आया और न ही सफाई। मुख्यमंत्री ने हल्की मुस्कान के साथ हाथ जोड़े और बिना कुछ कहे गाड़ी में बैठ गए। यह पूरा दृश्य कैमरे में कैद हो गया और कुछ ही देर में सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस खामोशी ने लोगों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए और बहस का नया दौर शुरू हो गया।
वायरल वीडियो से भड़की नाराजगी, विपक्ष हुआ हमलावर
महिला डॉक्टर के साथ हुई घटना का वीडियो सामने आने के बाद से ही राजनीतिक और सामाजिक हलकों में नाराजगी देखी जा रही है। विपक्षी दलों का आरोप है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति का नहीं बल्कि महिलाओं के सम्मान और धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है। विपक्ष का कहना है कि मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह के संवेदनशील मुद्दे पर स्पष्ट और जिम्मेदार बयान देना चाहिए। कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से माफी की मांग की है। वहीं, सोशल मीडिया पर भी लोग दो खेमों में बंटे नजर आ रहे हैं—एक वर्ग मुख्यमंत्री की चुप्पी को गलत ठहरा रहा है, तो दूसरा इसे अनावश्यक विवाद बताकर बचाव में उतर आया है।
कैमरों के सामने शांत रहे मुख्यमंत्री, सवाल बरकरार
दिल्ली पहुंचने के बाद भी हालात में कोई बदलाव नहीं आया। जब एक न्यूज चैनल ने फिर से हिजाब विवाद पर सवाल किया, तब भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। कैमरे के सामने उनका चेहरा शांत था, लेकिन उनकी चुप्पी कई संदेश छोड़ती नजर आई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कभी-कभी जवाब न देना भी एक रणनीति होती है, लेकिन इस मामले में चुप्पी ने विवाद को और हवा दे दी है। आम लोगों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या मुख्यमंत्री इस मुद्दे से बचना चाहते हैं या फिर सही समय का इंतजार कर रहे हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या आने वाले दिनों में इस पर कोई आधिकारिक बयान सामने आएगा।
सियासी असर और आगे की राह, क्यों अहम है यह मामला
हिजाब विवाद अब सिर्फ एक घटना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह बिहार की राजनीति में एक बड़े मुद्दे के रूप में उभर रहा है। महिला संगठनों और सामाजिक संस्थाओं का कहना है कि इस तरह के मामलों में स्पष्टता और संवेदनशीलता बेहद जरूरी होती है। समर्थकों का तर्क है कि मुख्यमंत्री के इरादों को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और पूरे मामले को बेवजह तूल दिया जा रहा है। लेकिन सच यह है कि मुख्यमंत्री की चुप्पी ने सस्पेंस को और गहरा कर दिया है। जब तक इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आता, तब तक सवाल, बहस और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जारी रहने की संभावना है।
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