मध्य प्रदेश के दतिया जिले के भांडेर कस्बे में मोहर्रम के अवसर पर एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द की ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। शुक्रवार रात जब मोहर्रम का पारंपरिक जुलूस अपने तय मार्ग से गुजर रहा था, तब इलाके के 37 ताजिया प्रसिद्ध चतुर्भुज नारायण मंदिर के सामने पहुंचकर एक-एक कर रुक गए। यहां सभी ताजियों की ओर से भगवान को सम्मान स्वरूप सलामी दी गई। इस दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में दोनों समुदायों के लोग मौजूद थे। पूरे आयोजन के दौरान प्रशासन की ओर से सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुआ। वर्षों से चली आ रही इस परंपरा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि आपसी सम्मान और विश्वास समाज को मजबूत बनाते हैं।
मंदिर के पुजारियों ने भी किया गर्मजोशी से स्वागत
ताजियों के मंदिर के सामने रुकने के बाद वहां पहले से मौजूद मंदिर के पुजारियों ने सभी ताजियों का फूल-मालाओं से स्वागत किया। यह दृश्य वहां मौजूद लोगों के लिए बेहद भावुक और प्रेरणादायक रहा। मंदिर परिसर में मौजूद श्रद्धालुओं और जुलूस में शामिल लोगों ने इस अनोखी परंपरा का सम्मान किया। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह आयोजन किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि पूरे कस्बे की साझा संस्कृति का हिस्सा बन चुका है। हर साल दोनों समुदाय इसी भावना के साथ इस परंपरा को निभाते हैं, जिससे आपसी विश्वास और भाईचारा और मजबूत होता है।
मंदिर का इतिहास भी जोड़ता है हिंदू-मुस्लिम एकता की कहानी
भांडेर के चतुर्भुज नारायण मंदिर का इतिहास भी सामाजिक सौहार्द से जुड़ा हुआ बताया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कई वर्ष पहले कस्बे के सोंतलाई तालाब से भगवान चतुर्भुज नारायण की प्रतिमा एक मुस्लिम हजारी परिवार को मिली थी। इसके बाद उसी परिवार ने मंदिर की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और मंदिर के रखरखाव के लिए भूमि भी दान की। बुजुर्गों के अनुसार आजादी से पहले कस्बे में कोई भी बड़ा धार्मिक आयोजन या जुलूस तब तक आगे नहीं बढ़ता था, जब तक हजारी परिवार का कोई सदस्य वहां उपस्थित न हो। यह परंपरा आज भी लोगों की आस्था और आपसी सम्मान का प्रतीक मानी जाती है।
बीमार बुजुर्ग महिला के आशीर्वाद के बाद आगे बढ़ा जुलूस
हजारी परिवार की परंपरा को आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है। परिवार की अब केवल एक बुजुर्ग महिला जीवित हैं, जो अस्वस्थ रहती हैं। इसके बावजूद इस वर्ष भी उन्हें विशेष व्यवस्था के तहत पालकी में बैठाकर मंदिर लाया गया। उनके पहुंचने और आशीर्वाद देने के बाद ही ताजिया जुलूस अपने अगले पड़ाव की ओर रवाना हुआ। इस पूरे आयोजन ने एक बार फिर यह साबित किया कि सदियों पुरानी परंपराएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं होतीं, बल्कि वे समाज में आपसी सम्मान, विश्वास और भाईचारे की मजबूत नींव भी तैयार करती हैं। भांडेर की यह परंपरा आज के समय में सामाजिक सौहार्द और एकता का प्रेरणादायक उदाहरण बनकर सामने आई है।
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